आंखें भरी हुई थी, मन में कई सवाल थे... आखिर हमारा कसूर क्या है। क्यों नहीं मिला हमारा मेहनताना। इतना कहते ही फूलजहां, (18) नूरजहां (14) और रुबीना (12) तीनों बहनों की आंखों में आंसू आ गए। क्योंकि लॉकडाउन में इन तीन बहनों के साथ उनके माता-पिता नहीं थे। वे लॉकडाउन से पहले ही अपने गांव चले गए थे और फिर ऐसे में वे लौट नहीं पाए।
फूलजहां ने बताया कि यहां बड़ी-बड़ी कोठियों में रहने वाले लोगों का दिल बहुत छोटा है। दो महीने तक काम करवा लिया और जब पैसे देने की बारी आई तो कोरोना का बहाना बनाकर बाद में पैसे लेने आने के लिए कह दिया है। इससे मन बहुत दुखी हुआ है।
इस बीच उन्होंने ये नहीं सोचा था कि इतने लंबे समय तक बिना पैसों के खाली रहकर उनका घर कैसे चलेगा। उन्हें दो वक्त निवाला मिलेगा भी या नहीं। इधर दो महीने कोरोना काल का समय हम तीन बहनों ने मिलकर कैसे काटा है, ये जिंदगी भर याद रहेगा। जो यहां खाया अपनी मेहनत का खाया।
यहां से बड़े निराश होकर अपने घर जा रहे हैं। क्योंकि जितना यहां का नाम सुना था, मन में तस्वीर उतनी ही धुंधली हो गई है। क्या करें... कई रातें तो बिना कुछ खाए ही बिताई हैं। मांग कर खाने की हमारी फितरत नहीं है। इसलिए पैदल ही घर निकल ली हैं और हमें उत्तर प्रदेश के हरदोई तक जाना है।