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प्रवासी मजदूरों का दर्द छलका, प्रशासन से अपील- हमें खाना चाहिए, मास्क तो गमछे से बना लेंगे

Thu, 21 May 2020 01:31 PM IST
पंचकुला ब्‍यूरो अमर उजाला, चंडीगढ़
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प्रवासी मजदूर - फोटो : अमर उजाला
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लॉकडाउन में हम गरीब तबाह हो गए हैं। कोई सुनने वाला नहीं है। हमें रोटी चाहिए। अब खाना मिलना भी मुश्किल हो रहा है। खाना नहीं खाएंगे तो जीएंगे कैसे। अब नेता लोग मास्क बांटकर अपना फर्ज निभाने में जुटे हैं। हम अपने गमछे से मास्क बना लेंगे, लेकिन रोटी कैसे खाएंगे। घर से रोज फोन आ रहा है। कहते हैं- लौट आओ, अब कभी परदेस नहीं जाना। कुछ लोग तो चले गए कुछ नहीं जा सके।
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कई जो पढ़े-लिखे नहीं हैं वे रजिस्ट्रेशन किस प्रकार करवाएं। यह भी दिक्कत है। हम समझ गए लोग कहते थे- जिन्हें वोट दिया वही चोट कर रहे हैं। आज दिख भी रहा है। नेता जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। यदि बच गए तो भूख से बीत रहा एक-एक क्षण वोट डालते समय याद रखेंगे। ये मजदूर हर रोज कमाकर खाते थे। दो महीने बीतने के बाद अब सब्र का बांध टूटने लगा है। सभी दिहाड़ीदार हैं। यह कहना था प्रवासी मजदूरों का..

इसी साल होनी थी बहन की शादी
मैं बिहार के छपरा जिले का रहने वाला हूं। इसी साल बहन की शादी होनी थी। अब रुक गई। अगले साल होगी। प्राइवेट काम करते थे। लॉकडाउन के कारण काम नहीं चल रहा है। घर से माता-पिता के रोज लौट आने के लिए फोन आते हैं। मां का रो-रोकर बुरा हाल है। पिता भी परेशान हैं। क्या करूं, किस प्रकार जाऊं। कोई उपाय नहीं है। मैं कई बार सेक्टर 43 गया, लेकिन पुलिस वापस भेज देती। कई दिन धूप में इधर-उधर के चक्कर लगाए, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ।
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- श्रीभगवान, प्रवासी
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बहुत मुश्किल का समय है

दो महीने हो गए हैं बैठे। घर का हाल क्या बताऊं। आप सभी समझदार हो। दाने-दाने के मोहताज हो गए हैं। कोई सुनने वाला नहीं है। घर जाना है। कमाने के लिए आए थे। शौक से वापस नहीं जा रही हूं। सभी दुख में हैं। पैदल कैसे पहुंचेंगे। सरकार को पूरी तरह से मदद करनी चाहिए। हमें मदद क्यों नहीं मिलती। यही समझ से परे है।
- श्रीमती, प्रवासी

सभी सपने टूट गए
दो महीने का बच्चा है। घर में खाना भी नहीं, क्या करें। किससे यह दुख कहें। कोई नहीं सुन रहा। सभी के साथ यही हाल है। तीन सप्ताह से नंबर लगाने की कोशिश करती रही। अब नंबर आया है। कहीं पर कोई सुनवाई नहीं है। सभी सपने टूट गए। पहली बार घर खाली हाथ जाएंगे। हमेशा अपनों के लिए कुछ न कुछ लेकर जाती थी। अब क्या करूं।
- रुचि सिंह, प्रवासी

घर जाकर देखेंगे कि क्या करना है
अभी घर पहुंचना है। वहीं जाकर देखेंगे कि क्या करना है। अब यहां किसके भरोसे रहें। घर पर परिवार के साथ ही भूखे रहेंगे तो भी यहां से घर अच्छा है। पहले घर जाने की उत्सुकता होती थी। घर से परिवार के लोग उपहार की मांग करते थे। अब घर में लोग भी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। परिवार के लोग यह कह रहे हैं कि किसी भी तरह से वापस आ जाओ।
- कामता सिंह, प्रवासी मजदूर

काफी दौड़ने के बाद रजिस्ट्रेशन हुआ
मुझे धनास से बिहार के बेतिया जाना है। बहुत परेशान हूं। लॉकडाउन के कारण काम नहीं है। रोज कमाना और रोज खाना है। शुक्रवार को बेतिया के लिए ट्रेन जाएगी। अब उसमें जाऊंगा। मन बहुत दुखी है। लॉकडाउन ने बर्बाद कर दिया।
- विजय कुमार, प्रवासी
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