लिवर ट्रांसप्लांट में सबसे बड़ी दिक्कत कैडेवर डोनेशन की आ रही है। किसी व्यक्ति के ब्रेन डेड घोषित होने के बावजूद परिजन उसके लिवर को देने में हिचकिचाहट महसूस कर रहे हैं। इससे लिवर ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों की वेटिंग लिस्ट बढ़ती जा रही है। पीजीआई में 50 से ज्यादा मरीज ट्रांसप्लांट की वेटिंग लिस्ट में हैं।
अब पीजीआई के सामने लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट ही एक विकल्प के तौर पर उपलब्ध है। संस्थान ने भी अब लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट करने का मन बना लिया है। पीजीआई के हीप्टोलॉजी डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रोफेसर अजय डुसेजा ने बताया कि संस्थान इस पर विचार कर रहा है। जल्द ही इस दिशा में फैसला लिया जाएगा।
उन्होंने बताया कि अगले साल यह सुविधा भी पीजीआई में शुरू होने की उम्मीद है। हालांकि चंडीगढ़ के कुछ प्राइवेट हास्पिटल में इस तरह के ट्रांसप्लांट हो रहे हैं, लेकिन प्रोसेस काफी महंगा है। यदि पीजीआई में होगा तो यह मात्र पांच से छह लाख रुपये में संभव हो सकेगा।
लिवर फेल पेशंट की संख्या लगातार बढ़ रही है और इस कारण ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग पेशंट की संख्या बढ़ी है। बिना लाइव रिलेटेड डोनेशन के ट्रांसप्लांट वेटिंग को कम नहीं किया जा सकता, क्योंकि कैडेवर से मिले ऑर्गन से गिनती के ही ट्रांसप्लांट संभव है।
क्या होता है लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट
मरीज का लिवर डैमेज होने के बाद सबसे पहले डोनर की तलाश की जाती है। डोनर मिलने के बाद उस जिंदा व्यक्ति के लिवर का कुछ हिस्सा लेकर मरीज के लिवर में प्रत्यारोपित किया जाता है।
उसके बाद जरूरी इंजेक्शन देकर उसे रीजेनरेट करने की कोशिश की जाती है। इस प्रक्रिया को लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट कहा जाता है। इसमें कोई वेटिंग नहीं होती।
इसलिए पीजीआई नहीं उठा रहा था कदम
डा. डुसेजा का कहना है कि लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट न करने के पीछे कुछ कारण है। पहला एक साथ दो पेशेंट पर रिस्क रहता है। पहला जिसके लिवर का कुछ हिस्सा लिया गया और दूसरा जिसे लिवर प्रत्यारोपित किया गया। दूसरा इसकी कॉस्ट भी काफी बढ़ जाती है।
कैडेवर ट्रांसप्लांट से करीब दो गुना रुपया खर्च होता है। पीजीआई में पिछले तीन साल से लिवर ट्रांसप्लांट हो रहे हैं। अब तक नौ ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं। इनमें से चार मरीजों की मौत हो गई है, जबकि पांच अब भी जीवित हैं। वे अपना जीवन सामान्य आदमी की तरह बिता रहे हैं।