हाईकोर्ट ने तुरंत संज्ञान लेकर पुलिस की अवैध हिरासत से हरजीत सिंह की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए एक वारंट अधिकारी को नियुक्त किया था। इसके बाद दिसंबर 1992 में जिला एवं सेशंस जज चंडीगढ़ को इस मामले में न्यायिक जांच का आदेश जारी कर दिया गया था। 1995 में आई रिपोर्ट के आधार पर 30 मई, 1997 को हाईकोर्ट ने यह हत्या का केस सीबीआई को सौंप दिया था।
कुल नौ में से पांच आरोपियों की सुनवाई के दौरान हो चुकी मौत, एक चल रहा भगोड़ा
जानकारी के मुताबिक थाना लोपोके के थाना प्रभारी एसआई धर्म सिंह ने रिपोर्ट में इस हत्या के मामले को पुलिस के साथ मुठभेड़ दिखाया था। इतना ही नहीं, मारे गए युवकों के शव भी परिवार को नहीं सौंपे थे और खुद ही अंतिम संस्कार कर दिया था। इस पर तीनों युवकों के परिवार ने शक जताया था कि पुलिस ने तीनों युवकों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी है।
जांच के दौरान सीबीआई ने पंजाब पुलिस के नौ पुलिस मुलाजिमों इंस्पेक्टर धर्म सिंह, एसआई राम लुभाया, एचसी सतबीर सिंह, दलजीत सिंह उर्फ मोटू, इंस्पेक्टर हरभजन राम, एएसआई, सुरिंदर सिंह, एएसआई गुरदेव सिंह, एसआई अमरीक सिंह और एएसआई भूपिंदर सिंह के खिलाफ आरोपपत्र पेश किया था। इसमें से पांच आरोपियों में हरभजन राम, राम लुभाया, सतबीर सिंह, दलजीत सिंह उर्फ मोटू और अमरीक सिंह की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है। जबकि एक आरोपी पुलिस मुलाजिम भूपिंदर सिंह को भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।