-दिल्ली से संकेत, चंडीगढ़ में हलचल
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अमर उजाला ब्यूरो
जालंधर। राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व बदलाव के बाद पंजाब भाजपा में भी परिवर्तन की प्रक्रिया निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। नितिन नबीन के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद दिल्ली से मिल रहे स्पष्ट संकेतों ने चंडीगढ़ में संगठनात्मक गतिविधियां तेज कर दी हैं। प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर चल रही अटकलों के बीच पार्टी की रणनीति अब सिख राजनीति और ग्रामीण वोट बैंक के इर्द-गिर्द केंद्रित होती नजर आ रही है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक संगठन महामंत्री से लेकर केंद्रीय पर्यवेक्षकों तक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भाजपा शहरी हिंदू मतदाताओं में अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है। अब राजनीतिक विस्तार सिख और दलित वोटरों के बिना संभव नहीं। इसी कारण प्रदेश भाजपा की कमान किसी ऐसे सिख चेहरे को सौंपने पर गंभीर विचार हो रहा है, जो शहरी-ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्वीकार्य हो और कमजोर पड़ते अकाली आधार में सेंध लगा सके।
पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने योजनाबद्ध ढंग से सिख नेताओं को पार्टी से जोड़ा है। पूर्व सांसद जगमीत सिंह बराड़, रवनीत सिंह बिट्टू, जालंधर के पूर्व सांसद सुशील कुमार रिंकू सहित कई प्रभावशाली चेहरे भाजपा मंच पर सक्रिय हैं। इसके अलावा सिंह ढिल्लों, राणा सोढ़ी, फतेहजंग बाजवा और रंजीत सिंह गिल जैसे नाम भी संगठन में मजबूत विकल्प के रूप में उभरे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि अब यह नेतृत्व केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का आधार बनेगा।
ग्रामीण पंजाब पर नजर
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पंजाब की करीब दो-तिहाई आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है जहां सिख मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनावों में भाजपा के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई और 2024 में पार्टी 18 फीसदी का आंकड़ा पार कर चुकी है लेकिन ग्रामीण सिख बहुल सीटों पर पकड़ अब भी सीमित है। इसी लक्ष्य के तहत किसान मुद्दों, ग्रामीण व्यापार, धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय प्रभावशाली समूहों से संवाद बढ़ाने की योजना पर काम चल रहा है। मंडल और बूथ स्तर पर सिख कार्यकर्ताओं की भागीदारी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
स्थायी स्वीकार्यता मुख्य लक्ष्य
प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर अश्वनी शर्मा, सुनील जाखड़ और किसी नए सिख चेहरे के नामों पर मंथन जारी है। एक वर्ग निरंतरता के पक्ष में है जबकि दूसरा मानता है कि सिख नेतृत्व के साथ भाजपा ग्रामीण पंजाब में नई सियासी जमीन तैयार कर सकती है। कुल मिलाकर, राष्ट्रीय नेतृत्व परिवर्तन के बाद पंजाब भाजपा सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक दिशा बदलने की तैयारी में है। ग्रामीण पंजाब में स्थायी स्वीकार्यता मुख्य लक्ष्य है।