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5 साल की जद्दोजहद के बाद इस महिला के पति को मिला शहीद का दर्जा, सियाचिन में तैनात थे

Tue, 25 Sep 2018 03:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा)
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पांच साल की लंबी जद्दोजहद के बाद मंजू अपने पति हरिओम को शहीद का दर्जा दिलवाने में कामयाब हुई। सरकार ने शहीद मानकर ढाई लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी। जबकि मौजूदा नीति के तहत शहीद परिवारों को 50 लाख रुपये दिए जा रहे हैं। पति की प्रतिमा लगवाने के लिए शहीद परिवार पंचकूला तो कभी रोहतक के अधिकारियों के चक्कर काट रहा है।
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हरियाणा में रोहतक जिले के गांव भालौठ निवासी मंजू ने बताया कि उसके पति हरिओम सेना में कार्यरत थे। 2011 में वे सियाचिन ग्लेशियर में तैनात थे। एक ऑपरेशन के दौरान बर्फ के नीचे दबने से मौत हो गई। सेना के नियमों के तहत सियाचिन में तैनात हर सैनिक को मौत होने पर शहीद का दर्जा मिलता है। उसे पति की मौत के दो साल बाद 2013 में इस बात का पता चला। जिस समय पति शहीद हुए, उस समय वह गर्भवती थी। साथ ही परिवार में और कोई कागजात तैयार कराने वाला नहीं था। इतना ही नहीं, उस समय कांग्रेस सरकार व उसके नेताओं ने भी सुध नहीं ली। उसने जिला सैनिक बोर्ड में अर्जी दी।

अब भाजपा सरकार ने 2016 के अंदर उसके पति को शहीद का दर्जा दिया, लेकिन प्रदेश सरकार ने मात्र ढाई लाख रुपये दिए। जबकि वर्तमान में 50 लाख रुपये शहीद के परिवार को मिल रहे हैं। जब उसने पूछा तो बताया गया कि 2011 की पॉलिसी के तहत राशि मिली है, जिसमें ढाई लाख ही प्रदेश सरकार की ओर से तय थे। मंजू का सवाल है कि यह राशि उस समय दी जाती। अब तो नई पॉलिसी के तहत राशि मिलनी चाहिए थी।  
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डीसी ऑफिस से मंजूर, फिर भी स्वास्थ्य विभाग नहीं लगा रहा प्रतिमा
मंजू ने बताया कि उसने जिला प्रशासन को अर्जी देकर गांव में उसके पति की प्रतिमा लगाने की मांग की थी। गांव के सरकारी स्कूल में पहले से दो शहीदों की प्रतिमाएं लगी हैं। ऐसे में जिला प्रशासन ने सरकारी अस्पताल में प्रतिमा लगाने का निर्णय लिया। इसके लिए फाइल सीएमओ को भेजी गई। सीएमओ ने चंडीगढ़ हेल्थ मुख्यालय दो साल पहले भेजी थी, लेकिन आज तक जवाब नहीं आया।

पांच बच्चों का करना पड़ रहा पालन-पोषण, 40 किलोमीटर दूर मिली नौकरी
मंजू ने बताया कि उसकी तीन बेटियां हैं। जबकि उसके जेठ व जेठानी का भी देहांत हो चुका है। ऐसे में उनके बेटे व बेटी की भी जिम्मेदारी उनके ऊपर है। पांचों बच्चों को पढ़ाने-लिखाने व पालन-पोषण के लिए काफी दिक्कत आती है। सरकार तो तीन बेटियों को मात्र 100 रुपये माह फीस देती है, जो एक भद्दा मजाक है। तीन माह पहले सरकार ने उसे महिला एवं बाल कल्याण विभाग में क्लर्क की नौकरी बहादुरगढ़ में दी है, जिसके लिए हर रोज 40 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। जबकि अन्य शहीद परिवारों को रोहतक में ही नौकरी मिली है।  

हरिओम को 2016 में सरकार ने शहीद माना। उस समय की पॉलिसी के तहत प्रदेश सरकार ने ढाई लाख की सहायता राशि दी है। साथ ही जिला सैनिक बोर्ड के प्रयासों से हरिओम की पत्नी मंजू को क्लर्क की जॉब मिल गई है। जहां तक प्रतिमा लगवाने की बात है, यह जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है।
- रोहताश मलिक, वेलफेयर आफिस, जिला सैनिक बोर्ड

पॉलिसी के तहत शहीद परिवार को सरकार ढाई लाख की सहायता राशि दे चुकी है। जहां तक प्रतिमा लगवाने का सवाल है, इस बारे में पड़ताल करवाई जा रही है। अभी तक प्रतिमा क्यों नहीं लगी। कहां दिक्कत है।
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- डॉ. यश गर्ग, डीसी

 
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