फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'काश...पंजाब को SGPC के झगड़ों से फुर्सत मिलती'

Thu, 26 Jun 2014 09:30 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
विज्ञापन
अमर उजाला के लिए लिखे इस विशेष आलेख में पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल कहते हैं कि सूबे की दिशाहीन राजनीति के कारण युवा आसानी से नशे के सौदागरों के जाल में फंस रहे हैं।
विज्ञापन


आज पंजाब की हालत मुझे उदास करती है। कभी पंजाब इतना मजबूत था कि 13 साल उग्रवाद झेलने के बावजूद 1993 में उसकी प्रति व्यक्ति आय देश में दूसरे नंबर पर थी। वह संपन्नता अब बीते दिनों की बात है।

आज पंजाब समृद्धि के इस पैमाने पर 11वें नंबर पर लुढ़क गया है। अवाम में कुशासन और भ्रष्टाचार का बोलबाला है जिससे लोगों में गुस्सा और हताशा है। बेरोजगारी भी चरम पर है।
विज्ञापन


सच तो यह है कि इसी बेरोजगारी से उपजी दिशाहीनता की वजह से नौजवान बड़ी आसानी से नशे के सौदागरों के जाल में फंस रहे हैं।

कब्जे और कंट्रोल की लड़ाई में उलझे हैं राजनेता

और इस सूरतेहाल के बरक्स सूबे के राजनेता क्या कर रहे हैं? वे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी पर कब्जे और कंट्रोल की लड़ाई में उलझे हैं। धार्मिक पहचानों के इर्द-गिर्द ध्रुवीकरण करना-कराना ही सूबे की सियासत का मुख्य काम हो गया है।

पूर्व खालिस्तान समर्थकों और अकाली धड़ों के बीच चरमपंथी दिखने की होड़ मची रहती है जिसमें सियासत महज लोगों को बांटने का औजार बनकर रह गई है। इस होड़ के कई फूहड़ और नाटकीय नजारे मुल्क ने देखे हैं।

सबसे ताजा और अशोभनीय नजारा इसी माह 6 जून को स्वर्ण मंदिर परिसर में ब्लू स्टार ऑपरेशन की बरसी पर झलका था। उस दिन सिमरनजीत सिंह मान गुट और एसजीपीसी सदस्यों ने तलवारें चलाकर एक-दूसरे को लहूलुहान कर दिया था।

खत्म हो चुका है खालिस्तानी आतंकवाद

बहरहाल, अब पंजाब से खालिस्तानी आतंकवाद का पूरी तरह सफाया हो चुका है। पाकिस्तान और अन्य देशों में कुछ खालिस्तान समर्थकों की मौजूदगी के बावजूद प्रदेश में इसकी वापसी नामुमकिन सी है।

राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद भी पुलिस और इंटेलिजेंस एजेंसियों का तालमेल विध्वंसक तत्वों की पैठ और राज्य में उनके नेटवर्क को ध्वस्त कर आतंकवाद विरोधी माहौल कायम करने में पूरी तरह सफल रहा है।

इसके साथ ही महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अब राज्य के लोगों की इस विचारधारा में कोई रुचि नहीं रही। खालिस्तानी कट्टरवादी अब युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत नहीं रहे। कार्यकर्ताओं की भर्ती के लिए किए जा रहे इन तत्वों के प्रयास लगातार विफल हो रहे हैं।

सूबे में सब कुछ ठीक-ठाक मानना मूर्खता है

केंद्रीय बलों की मदद से पंजाब पुलिस ने पीड़ा और बलिदान की असाधारण कीमत चुकाकर आतंकवाद पर विजय पाई है। उसने एक समय में भारत से अलग होने के कगार पर पहुंच चुके पंजाब की न केवल रक्षा की है बल्कि 1980 और 90 के दशक में खालिस्तानी लुटेरों का पर्याय बन चुके प्रदेश में अमन का ऐसा माहौल कायम किया है जिसमें लोग दहशतगर्दों को नफरत भरी निगाह से देखते हैं।

लेकिन यह कहना भी मूर्खता होगी कि अब पंजाब में सब कुछ ठीक-ठाक है। हमें उन कारणों को नहीं भूलना चाहिए जिनसे राज्य में आतंकवाद पनपा था। राजनीतिक स्वार्थ से उपजा विनाश, धार्मिक भावनाओं का जोड़-तोड़ और जनता में व्याप्त रोष कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कारक थे जिनके चलते राज्य आतंकवाद की त्रासदी झेलने को मजबूर हुआ।

साथ ही यह भी याद रखना होगा कि देश के दुश्मनों विशेषकर पाकिस्तान ने किस हद तक इन सबका फायदा उठाया। असंतोष के अनिश्चित दौर में यह भविष्यवाणी करना मुश्किल है कि कब उकसावा हिंसक झड़पों को व्यापक रूप दे दे।
विज्ञापन

नशे को गंभीरता से लेने की जरूरत है

मैं फिर से कह रहा हूं कि पंजाब में नशे की लत और बढ़ते ड्रग्स के कारोबार को बेहद गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। यह केवल सामाजिक समस्या या लॉ-ऑर्डर का मुद्दा नहीं है बल्कि यह सुरक्षा संबंधी एक चुनौती है जिसे देसी असामाजिक तत्वों और राजनीतिक आकाओं की शह मिल रही है। साथ ही यह पंजाब में आतंकवाद को फिर से जिंदा करने की पाकिस्तानी साजिश के लिए खाद-पानी बन रही है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें