ग्लूकोमा के केस लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पीजीआई में अब तक 23 हजार मरीज रजिस्टर्ड हो चुके हैं। पीजीआई के ग्लूकोमा एक्सपर्ट डॉ. एसएस पांडव के मुताबिक इस बीमारी के 90 प्रतिशत केस अब तक डायग्नोज नहीं हो पाते। लोगों को लगता है कि यह एक रुटीन प्रक्रिया है।
बढ़ती उम्र में नजर कमजोर हो ही जाती है, लेकिन जब एक बार ग्लूकोमा हो जाता है तो उसका कोई इलाज नहीं है। यदि इसके बारे में जल्दी पता चल जाए तो उसे काफी हद तक रोका जा सकता है। सबसे अहम बात यह है कि लोगों को ग्लूकोमा के बारे में जानकारी होनी चाहिए। जब भी उम्र 40 के पास पहुंचे तो एक बार जरूर आंखों का चेकअप कराएं।
ग्लूकोमा सपोर्ट ग्रुप के सहयोग से रविवार 27 जुलाई को एडवांस आई सेंटर में सुबह 11 से 12 बजे तक एक घंटे का अवेयरनेस प्रोग्राम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें मरीजों को बताया जाएगा कि ग्लूकोमा के दौरान उन्हें क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि अपना जीवन अच्छे तरीके से बिता पाएं।
क्या होता है ग्लूकोमा
ग्लूकोम को आम भाषा में काला मोतिया भी कहा जाता है। आंख के अंदर अंगों के पोषण के लिए एक तरल पदार्थ होता है। पोषक के बाद यह तरल पदार्थ आंख के महीन छिद्र से बाहर निकलता है।
उम्र के साथ छिद्र तंग होने शुरू हो जाते हैं। इससे तरल पदार्थ के निकलने की प्रक्रिया थोड़ी बाधित होती है। इससे आंख का प्रेशर बढ़ने लगता है। आंख का बढ़ा प्रेशर ऑप्टिक नर्व (आंखों से दिमाग को सिग्नल भेजने वाली नर्व) को डैमेज करती है।
आमतौर पर ऐसा आंखों पर ज्यादा जोर पड़ने से होता है। दरअसल, ऑप्टिक नर्व काफी सेंसिटिव होती है, इसलिए ज्यादा प्रेशर पड़ने पर यह ब्लॉक हो जाती है।
इससे दिखना बंद हो जाता है। हालांकि आंख के बढ़े प्रेशर का मतलब यह कतई नहीं है कि उस शख्स को ग्लूकोमा हो गया है, लेकिन इससे ग्लूकोमा का खतरा बढ़ जाता है।
ये रिस्क फैक्टर हैं तो हो सकता है ग्लूकोमा
1. परिवार के किसी सदस्य को हुआ हो
2. यदि शुगर के मरीज हैं तो
3. माइनेस नंबर है और बार-बार कम हो रहा है
4. 45 वर्ष के उम्र के पार हैं
5. अंधेरे में देर से नजर आना
6. रोशनी में अलग-अलग रंग दिखना
7. अस्थ्मा व आथराइटिस जैसे रोगों में लंबे समय तक स्टेरायल ले रहे हों
8. कभी आंख का कोई जख्म हुआ हो या कोई सर्जरी हुई हो
9. यह बच्चों में भी हो सकता है
आंखों की चली जाती है रोशनी
ग्लूकोमा के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके चलते नजर का जो नुकसान हो गया, उसका कोई इलाज नहीं है। अगर पता न चले तो यह मर्ज धीरे-धीरे बढ़ता रहता है और ज्यादा बढ़ जाने पर अंधेपन की भी नौबत आ सकती है। हां, अगर इसका पता वक्त रहते पता चल जाए तो आगे और नुकसान से बचने के लिए इलाज और देखभाल की जा सकती है।
45 के बाद रुटीन चेकअप कराएं
45 साल की उम्र के बाद ग्लूकोमा होने के चांस बढ़ जाते हैं। 45 की उम्र के बाद आंखों का नियमित चेकअप कराते रहें। हो सकता है इस उम्र के लोगों को लगे कि उनकी नजर मोतियाबिंद की वजह से कमजोर हो रही है, लेकिन हो सकता है कि नजर की कमजोरी ग्लूकोमा की वजह से हो। ऐसे में सलाह यह है कि 45 की उम्र के बाद आंखों का रुटीन चेकअप कराते रहें।