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बिखराव की आशंका को देख एक साथ आए धुर विरोधी किसान नेता, दिल मिलें या न मिलें, जनता में दिखेंगे साथ

Tue, 16 Feb 2021 01:48 PM IST
ajay kumar यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
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किसान आंदोलन। - फोटो : अमर उजाला
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किसान नए कृषि कानूनों के खिलाफ अपने आंदोलन को ठंडा नहीं पड़ने देना चाहता। बॉर्डर पर लगे धरनों के लंबा खिंचने से आंदोलनकारी पीछे हटने न लगें, इसलिए धुर विरोधी किसान नेताओं ने हाथ मिला लिए हैं। उन्हें आंदोलन के बिखराव की आशंका थी। राकेश टिकैत, गुरनाम चढूनी व रतन मान सरीखे नेता हरियाणा में यूं ही एक मंच पर नहीं आए। 

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उन्हें इस बात का बखूबी अहसास हो गया है कि अपनी डफली, अपना राग अलाप कर केंद्र सरकार से कोई भी मांग नहीं मनवाई जा सकती। चूंकि, सरकार ने भी सख्त रुख अपनाया है। संयुक्त किसान मोर्चा को अगले दौर की वार्ता के लिए अभी तक न्योता नहीं भेजा गया। इससे भी किसान नेताओं में अंदरखाने बेचैनी है, चूंकि डेडलॉक की स्थिति बन चुकी है।

अहम मुद्दा इस समय संघर्ष को सिरे चढ़ाना है, यह बात पुराने बुजुर्गों ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे बड़े किसान नेताओं को समझाई है। भले ही उनके दिल आपस में मिलते हों या नहीं लेकिन जनता में साथ दिखना जरूरी है। यह बात बिना देरी के भाकियू हरियाणा के दोनों गुटों के अध्यक्षों गुरनाम चढूनी व रतन मान के दिमाग में भी बैठ गई। इसलिए न केवल उन्होंने करनाल जिले की महापंचायत में मंच सांझा किया, बल्कि आगे भी एकजुट दिखेंगे।

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चढूनी अभी तक राकेश टिकैत से भी दूरी बनाए हुए थे। उन्होंने कंडेला व पिपली महापंचायत में उनके साथ मंच सांझा नहीं किया। लेकिन टिकैत के बढ़ते प्रभाव व किसानों की एकत्रित भीड़ को देखकर वह समझ गए कि एकला चलो से बात नहीं बनने वाली। इससे किसानों में तो गलत संदेश जाएगा ही जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत होने के बजाए आने वाले दिनों में ढीली भी हो सकती है। इसलिए टीम चढूनी ने साथ-साथ आगे बढ़ना ही उचित समझा।

डेडलॉक टूटना चाहिए, बातचीत को तैयार : बैंस
आंदोलनरत किसान सरकार से वार्ता को तैयार हैं। वे डेडलॉक की स्थिति नहीं चाहते। उनका मानना है कि संवाद जारी रहना चाहिए। भाकियू प्रेस प्रवक्ता राकेश बैंस ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कहने के बावजूद सरकार की तरफ से बातचीत का प्रस्ताव आज तक नहीं आया। सरकार उन्हें थकाकर घर भगाने की न सोचे। आंदोलन का हल वार्ता से ही निकलेगा।

रेल रोको के लिए बन रही खास रणनीति
18 फरवरी को प्रस्तावित रेल रोको आह्वान को संयुक्त किसान मोर्चा किसी सूरत में विवादों में नहीं पड़ने देना चाहता। दिल्ली घटना की पुनरावृत्ति रेल रोकने के दौरान न हो इसलिए खास रणनीति बनाई जा रही है। किसान नेता विशेष टीमों के गठन पर भी विचार कर रहे हैं। ये टीमें किसी सूरत में रेल रोको आंदोलन के दौरान अप्रिय घटना नहीं होने देंगी। न ही सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाएगा।
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