मैक्स सुपर स्पेशलिएटी हॉस्पिटल ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपना अलग मुकाम बनाने में कामयाबी हासिल की है।
हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने स्पेशल इम्यून-मॉड्युलेशन और डीसेंसटाइजेशन प्रोटोकॉल के साथ ब्लड ग्रुप की बाधा तोड़ते रीजन का पहला सफल एबीओ-कम्पटेबल अंग प्रत्यारोण किया है।
इसके तहत अलग ब्लड ग्रुप की किडनी को दूसरे मरीज को लगाने में सफलता मिली है। फिलहाल, मरीज पूरी तरह से स्वास्थ है। बता दें कि अब तक किडनी देने और लेने वाले के बीच रक्त ग्रुप का मिलान होना जरूरी था।
इस परेशानी के कारण क्रोनिक किडनी फेल्योर के कई मरीजों को ट्रांसप्लांट से वंचित होना पड़ता है। ऐसे मरीजों को जिंदगी भर डायलिसिस करवाना पड़ता है, लेकिन अब ए और बी ग्रुप के दानी अब ओ ग्रुप प्राप्तकर्ता को भी आसानी से किडनी दान कर सकते हैं।
मैक्स के विशेषज्ञों का कहना है कि यह उत्तर भारत में एक नई शुरुआत है। इससे उन हजारों किडनी मरीजों को एक नई उम्मीद बंधी है, जो ब्लड ग्रुप मैच न होने के कारण ट्रांसप्लांट के लिए इंतजार कर रहे थे।
मैक्स के यूरोलाजिस्ट एंड ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. सानंदा बाग ने बताया कि पटना निवासी विजय किशोर सिंह का 2011 में किडनी प्रत्यारोपण हुआ था।
किशोर को उनके पिता ने एक किडनी दी थी। किशोर व उनके पिता का ही ब्लड ग्रुप एक ही था। दानकर्ता पिता की अधिक उम्र होने के कारण किडनी प्रत्यारोपण के दो साल बाद वह असफल हो गया (ग्राफ्ट लॉस)। विजय को फिर से डायलसिस पर निर्भर होना पड़ा।
आखिर में उनकी पत्नी ने किडनी देने की पेशकश की। पत्नी का ब्लड ग्रुप अलग था। वे मैक्स अस्पताल के डॉक्टरों के संपर्क में आईं। डॉ. बाग व उनकी टीम ने किडनी बदल दी।
विजय की किडनी पूरी तरह से काम कर रही है। सामान्य संचालन के बाद उन्हें घर भेज दिया गया है।
ट्रांसप्लांट बड़ी चुनौती
डॉ. बाग ने बताया कि एबीओ इंकम्पैटेबल ट्रांसप्लांट एक चुनौती है। इसके तहत ओ ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति को ए और बी ब्लड ग्रुप के लोग भी किडनी ट्रांसप्लांट कर सकेंगे।
डॉ. बाग के मुताबिक, ओ ब्लड ग्रुप में ए और बी ब्लड ग्रुप के एंटीबाडीज पाए जाते हैं। ओ ब्लड ग्रुप में प्लाजा ट्रांसप्लांट के जरिए ए और बी एंटीबाडीज निकाल लेते हैं। इसे पूरे शून्य पर लाकर किडनी ट्रांसप्लांट कर लेते हैं।
क्या कहना है मरीज का
मरीज विजय किशोर सिंह ने बताया कि मेरी भूख पूरी तरह से खत्म हो गई थी और कुछ भी तरल भी नहीं पी पाता था, जबकि बहुत प्यास लगती थी। मैं इतना कमजोर हो गया था कि चल भी नहीं पाता था और मेरे शरीर में खून का स्तर काफी कम हो गया था।
नियमित डायलसिस के बावजूद मेरी हालत लगातार खराब होती गई और मुझे अपने शरीर में रक्त निर्माण की प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए निरंतर दवाएं लेनी पड़ती थी। ट्रांस्प्लांट के बाद सोमवार को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया।