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दिव्यांग बच्चों की गतिविधियों पर रखें नजर, दें सुरक्षित वातावरण

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चंडीगढ़। पीजीआई मनोचिकित्सा विभाग व रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से दिव्यांग बच्चों की विभिन्न समस्याओं व उनके समाधान पर दो दिवसीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इसमें देशभर के 200 से ज्यादा विशेषज्ञों ने भाग लिया। विशेषज्ञों ने दिव्यांग बच्चों के शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक सुरक्षा पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम का शुभारंभ पीजीआई मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. देवाशीष बासु ने किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एनआईपीवीडी देहरादून के निदेशक डॉ. हिमांशु दास थे।
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बंगलूरू के डॉ. थॉमस ने कहा कि ऐसे बच्चों को लेकर वातावरण में जागरूकता उत्पन्न करने की जरूरत है। अभिभावकों को विशेष रूप से सचेत रहना होगा। उन्हें बच्चों में आने वाले छोटे-छोटे परिवर्तन पर नजर रखनी होगी। कई बार शोषण का शिकार हुए बच्चे अपनी बात व्यक्त नहीं कर पाते। इससे वे तनाव में चले जाते हैं। कई केस में तो स्थिति आत्महत्या तक पहुंच जाती है। इसके विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए उन्हें सुरक्षित माहौल देने का प्रयास करना होगा, ताकि वे अपनी समस्या पर खुलकर बात कर सकें।
प्रोजेक्टिव तकनीक बेहद कारगर
पीजीआई मनोचिकित्सा विभाग के क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट व कार्यक्रम के संयोजक सचिव डॉ. कृष्णा सोनी ने बताया कि कई बार ऐसे केस में अभिभावक बच्चे की परेशानी समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसी स्थिति में उन अभिभावकों को देरी किए बिना तत्काल अपने बच्चे को विशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिए। क्योंकि विशेषज्ञ प्रोजेक्टिव तकनीक की मदद से अलग-अलग विकल्प के जरिए बच्चों की परेशानी आसानी से समझ लेते हैं। ऐसा करके समय रहते दिव्यांग बच्चों की परेशानी पता लगाकर उसका समाधान किया जा सकता है। इन बिंदुओं को गंभीरता से लेकर दिव्यांग बच्चों के अभिभावक बच्चों को डिप्रेशन जैसी स्थिति में जाने से रोक सकते हैं।
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शोषण का तीन गुना ज्यादा खतरा
दिल्ली एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. विजय ने बताया कि सामान्य बच्चों की तुलना में दिव्यांग बच्चों के साथ विभिन्न प्रकार के शोषण होने का खतरा 3 गुना ज्यादा रहता है। ऐसे में उनकी मनोस्थिति को समझने का प्रयास करते हुए उन्हें सुरक्षित वातावरण महसूस कराने की सबसे ज्यादा जरूरत है, ताकि बच्चा अपने साथ हुए शोषण के बारे में अपने अभिभावक को खुलकर बता सके।
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