जाट आरक्षण को लेकर जहां हाईकोर्ट ने गेंद पिछड़ा वर्ग आयोग के पाले में डाल दी है, वहीं जाट नेताओं पर हाईकोर्ट के आदेशों के चलते रिकवरी की तलवार लटक गई है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को रिकवरी के लिए ऐसी याचिका दाखिल करने की छूट दी है, जिसमें जिनसे रिकवरी की जानी है उनके नाम और कितने खर्च की रिकवरी करनी है, उसका विस्तृत ब्योरा हो।
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हिंसा, बंद, जाम और रेलवे को हुए नुकसान की भरपाई किससे की जाए, अब यह सवाल पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट हल करेगा। आंदोलन के बाद दाखिल याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरक्षण का लेकर फैसला सुनाया जा चुका है और इस मुद्दे को देखना अभी बाकी है। हालांकि, उस समय के मुकाबले अभी स्थिति स्पष्ट है और ऐसे में बेहतर आंकड़ों के साथ ही पर्याप्त सबूत लेकर नुकसान की भरपाई किससे करवाई जाए, ऐसी याचिका दाखिल की जाए।
नुकसान का बोझ क्यों भुगते आम नागरिक
जाट आरक्षण
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याचिकाकर्ता विशाल अग्रवाल ने अपील की थी कि हिंसा करने वालों, संगठनों आदि को यह संदेश दिया जाना जरूरी है कि आखिर यदि वे पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाएंगे तो उसका खामियाजा भुगतना होगा। आंदोलन के दौरान पैरा मिलिट्री फोर्स की तैनाती की गई और भी व्यवस्था पर भारी खर्च हुआ। यह बोझ हरियाणा का आम नागरिक क्यों भुगते?
इसे तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों को भुगतना चाहिए। हाईकोर्ट ने याची की दलील से सहमति जताते हुए अब उसे इस दौरान हुए खर्च और नुकसान की वसूली के लिए याचिका दाखिल करने की छूट दे दी है। साथ ही यह भी कहा है कि ऐसे आंकडे़, सबूत दें कि ये लोग नुकसान के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे नामों के साथ याचिका दाखिल की जाए, जिनसे खर्च की वसूली हो सके।
नुकसान पर सरकार और एसोचैम का आंकलन अलग-अलग
जाटों का विरोध प्रदर्शन
हाईकोर्ट के इन आदेशों ने जाट नेताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में अब यह देखना रोचक होगा कि आखिर किन-किन जाट नेताओं के नाम इस याचिका का हिस्सा बनते हैं और कुल कितने की रिकवरी राशि सरकारी खजाने के लिए वसूल किए जाने की अपील की जाती है क्योंकि आंदोलन के बाद नुकसान का जो अंदाजा लगाया गया था वह हरियाणा सरकार के अनुसार 850 करोड़ जबकि एसोचैम के अनुसार 20 हजार करोड़ के करीब था।