हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग को लेकर सुलगी चिंगारी को भांप न पाने के कारण पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश बिंदल की एकल बेंच की ओर से जारी अवमानना नोटिस पर हरियाणा के मुख्य सचिव और डीजीपी ने जवाब देने के लिए और समय मांगा है।
बेंच का कहना है कि मामले में हाईकोर्ट के आदेश की अनदेखी किए जाने के कारण ही प्रदेश में उपद्रव और हिंसा की नौबत आई। हालांकि अतिरिक्त गृह सचिव ने दाखिल जवाब में आंदोलन के दौरान उठाए कदम की जानकारी हाईकोर्ट को दी है।
साल 2010 में जाट आंदोलन के बाद सरकार ने हाईकोर्ट को भरोसा दिलाया था कि भविष्य में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए माकूल व्यवस्था की गई है।
लुधियाना की आल इंडिया एंटी करप्शन फेडरेशन के वैभव जैन ने एडवोकेट सुमन जैन के माध्यम से दायर अवमानना याचिका में कहा था कि साल 2010 में भी जाट आरक्षण समिति की ओर से 13 सितंबर को बंद का आह्वान किया गया था, लेकिन इस
दौरान बड़े स्तर पर हिंसा हुई थी। तब भारी नुकसान हुआ था।
उल्लेखनीय है कि इस दौरान मिर्चपुर में जींद के सेशन जज को गाड़ी से बाहर निकालकर उनकी गाड़ी को आग के हवाले कर दिया गया था।
बताया था कि ऐसी स्थिति को लेकर नुकसान के मुआवजे और दोषी आंदोलनकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी।
याची ने उस वक्त कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के नुकसान के एक मामले में राज्यों को केटी थॉमस और एफसी नारीमन कमेटियों की सिफारिशें लागू करने को कहा था।
थॉमस कमेटी के दिशा-निर्देश के अनुसार उपद्रव नियंत्रण के मापदंड तय होने थे और नरीमन कमेटी की सिफारिश के दिशा-निर्देश के मुताबिक मुआवजे के मापदंड तय किए जाने थे।
थॉमस कमेटी की सिफारिशें :
थॉमस कमेटी के अनुसार यदि कोई संघर्ष करता है तो इसके लिए संस्था या व्यक्ति को अनुमति लेनी होगी। प्रदर्शन के दौरान कोई हथियार नहीं होना चाहिए। पुलिस प्रदर्शन पर लगातार नजर रखे और यदि स्थिति हाथ में हथियार दिखे तो पास के थाना या जिलों की पुलिस बुलाई जानी चाहिए। सिफारिश के मुताबिक रोड मैप तैयार किया जाना है, जिसमें प्रदर्शन की स्थिति को भांपते हुए इंटेलिजेंस को रिपोर्ट लेते हुए सरकार को अवगत कराना है, ताकि समय रहते पुख्ता प्रबंध किए जा सकें। नरीमन क मेटी की सिफारिश के मुताबिक क्लेम कमीशन बनना चाहिए और नुकसान का आंकलन करने के लिए मौजूदा सरकारी स्त्रोतों के अलावा क्लेम कमीशन निजी वेलुएटर की मदद भी ले सकता है। मुआवजा नुकसान की कीमत से दोगुना से अधिक नहीं होना चाहिए। इसकी भरपाई किससे की जानी है, इसके लिए भी उचित दिशा-निर्देश सिफारिश में हैं।