जाट आरक्षण को लेकर सोनीपत में महापंचायत
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हरियाणा में जाटों को आरक्षण दिए जाने के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जारी सुनवाई सोमवार को अधूरी रह गई। वहीं, सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने आरक्षण पर लगी रोक हटवाने के लिए अपनी दलीलों का क्रम जारी रखा। हालांकि सोमवार को भी सुनवाई अधूरी रही। जस्टिस एसएस सारों व जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने आगे सुनवाई की तारीख 18 जुलाई तय कर दी।
सोमवार को हरियाणा सरकार ने जाटों को आरक्षण दिए जाने के अपने फैसले को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट के सामने कई दलीलें रखी। करीब दो घंटे चली सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में भी साफ किया गया है कि विशेष हालात में राज्य को 50 फीसदी आरक्षण की सीमा लांघने का अधिकार है। इस पर हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार से पूछा कि ऐसी कौन सी विशेष परिस्थितियां थीं, जिनके तहत जाटों को आरक्षण का लाभ दिया गया है।
सोमवार को सुनवाई शुरू होते ही हरियाणा सरकार की ओर से कहा गया कि जाटों को आरक्षण देने के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाएं आधारहीन हैं। हरियाणा सरकार ने जाटों को किसी प्रशासनिक आदेश के जरिए नहीं, बल्कि कानून बनाकर आरक्षण दिया है। सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए कई आदेशों का हवाला भी दिया गया। कहा गया कि देश में भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नता है।
ऐसे में आरक्षण का खाका पूरे देश में एक जैसा नहीं हो सकता। हरियाणा सरकार की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट भी इस बात को मान चुका है कि यदि सरकार किसी समुदाय विशेष को आरक्षण की जरूरत महसूस करती है तो आरक्षण दिया जा सकता है। आरक्षण की अधिकतम सीमा के 50 प्रतिशत होने पर हरियाणा सरकार ने सवाल उठाते हुए कहा कि तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है और वहां आरक्षण एक कमीशन के माध्यम से लागू किया गया है।
उन्होंने हाईकोर्ट से यह भी कहा कि तमिलनाडु में आरक्षण के भले ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी वहां आरक्षण पर रोक नहीं लगाई है। हरियाणा सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि प्रदेश सरकार ने पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए कानून बनाकर आरक्षण का लाभ दिया है। ऐसे में 50 प्रतिशत की सीमा लांघी जा सकती है।