कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और उनकी पत्नी सोफी के साथ एक फोटो के बाद चर्चा में आए पूर्व खालिस्तानी समर्थक जसपाल सिंह अटवाल का हृदय परिवर्तन हो गया है। विदेशों में खालिस्तानी मूवमेंट का समर्थक रहा जसपाल सिंह अब कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका समेत अन्य देशों में शरण लिए भारत विरोधी खालिस्तानियों को बेनकाब करने के लिए काम कर रहा है।
इंडो कैनेडियन जसपाल सिंह अटवाल को प्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय सिख यूथ फेडरेशन (आईएसयूएफ) का सदस्य बनाया गया था। उसे पंजाबी राजनेता मलकीत सिंह सिद्धू की हत्या के लिए भी दोषी ठहराया गया था। कुछ दिन पहले मोदी सरकार द्वारा जसपाल अटवाल का नाम काली सूची से हटा दिया गया है। जसपाल ने आरोप लगाया कि खालिस्तान के नाम पर यह लोग अपना कारोबार चला रहे हैं।
अटवाल के अनुसार, कांग्रेस के शासनकाल के दौरान स्वर्ण मंदिर पर हमला किया गया था। कांग्रेस के राज में ही सिख विरोधी दंगे हुए। सिखों को जेल में डाला गया और उन्हें ब्लैकलिस्ट किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिखों के जख्मों पर मरहम लगाया है। वर्तमान सरकार ने 1984 दंगों के कुछ अपराधियों को जेल में डाल दिया है।
काली सूची को खत्म किया जा रहा है। सिख राजनीतिक कैदियों को मुक्त किया जा रहा है। उन्होंने एक महीने तक पंजाब के सभी इलाकों का दौरा किया, तो देखा कि हर जगह सांप्रदायिक सद्भाव है।
भारत में खालिस्तान के बारे में कोई नहीं जानता
जसपाल ने दावा किया कि भारत में खालिस्तान के बारे में कोई नहीं जानता। भारत के बाहर कुछ ऐसे लोग हैं, जो पे रोल पर काम कर भारत के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहे है। उन्होंने अमेरिका स्थित सिख फॉर जस्टिस रेफरेंडम 2020 अभियान के कानूनी सलाहकार गुरवपंत सिंह पन्नू के बारे में दावा किया कि उनका न तो पंजाब में और न ही विदेश में कोई आधार है।
वह सोशल मीडिया पर ही भारत विरोधी अभियान चला रहा है। उन्होंने दावा किया कि कुछ खालिस्तानी नेता आईएसआई के पे रोल पर थे और अपने दुर्भावनापूर्ण अभियान को आगे बढ़ाने के लिए कुछ तथाकथित महिला पंजाबी गायकों से हाथ मिलाया हुआ है। ये लोग अब सामने आ रहे हैं। हमने उनके खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया है, हम उन्हें हर मंच पर उजागर कर रहे हैं।
परिणामस्वरूप लोगों ने खालिस्तानियों से दूरी बनाना शुरू कर दिया है। जसपाल ने दावा किया कि वह कभी इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन के सदस्य नहीं रहा। यह संस्था विदेशों में बसे पंजाबी युवाओं के बीच सॉफ्ट टारगेट ढूंढते हैं। उन्हें झूठी तस्वीर दिखाने की कोशिश करते हैं। जब इन युवाओं को खालिस्तान के छिपे इरादे का एहसास होता है तो वे उन्हें छोड़ देते हैं।
श्री हजूर साहिब की अपनी यात्रा को याद करते हुए जसपाल ने कहा कि इस पवित्र स्थल पर हिंदू व सिखों को एक साथ सेवा करते देख कर बहुत संतुष्टि हुई।
1984 में स्वर्ण मंदिर पर हुए हमले के बाद सिखों में बहुत आक्रोश था। मैं युवा था और उस दौरान पैदा हुई नफरत की भावना में बह गया था। अब मैं खालिस्तान की बहुत मांग करने वालों के खिलाफ डट गया हूं और विदेशों में बैठे तथाकथित खालिस्तानियों का पर्दाफाश कर रहा हूं।
- जसपाल सिंह