जालंधर लोकसभा उपचुनाव में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की जीत ने नई सियासी इबारत लिख दी है। उपचुनाव के नतीजों से न केवल मुख्यमंत्री भगवंत मान का सियासी कद बढ़ा है, बल्कि इस जीत को पंजाब में आप सरकार के एक साल के कामकाज पर जनता की मुहर के रूप में भी देखा जा रहा है। मान सरकार पर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे कानून व्यवस्था, बेअदबी और खालिस्तान जैसे सवाल भी जनता ने दरकिनार कर दिए। पंजाब में सत्तासीन होने के बाद आम आदमी पार्टी की किसी भी चुनाव में यह पहली जीत है। वहीं, संगरूर लोकसभा उपचुनाव गंवाने के बार जालंधर में जीत के रूप में पार्टी को बड़ी संजीवनी मिली है।
उधर, छह केंद्रीय मंत्रियों समेत दिग्गज नेताओं की फौज उतारने के बावजूद लोकसभा चुनाव से पहले जालंधर में जमानत तक न बचा पाने वाली भाजपा के पंजाब में पांव मजबूत करने के दावों की पोल खुल गई है। मुख्यमंत्री मान पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह दिल्ली के इशारों पर चलते हैं। दिल्ली से जो आदेश आता है, उसको बजाते हैं। 2022 के चुनाव में दिल्ली से आए राघव चड्डा व संदीप पाठक की टीम ने प्रचार की कमान संभाली थी। लेकिन आप ने यह उपचुनाव पूरी तरह से सीएम भगवंत मान के नेतृत्व में लड़ा गया।
सीएम मान ने जालंधर में खुद कैंप कर दस दिन लगातार प्रचार किया। गांव-गांव रोड शो किए, रूठों को मनाया और कांग्रेस व भाजपा के कैंप में भी सेंध लगाई। विपक्ष के तमाम आरोपों और सरकार पर सवालों के बीच जालंधर की जनता ने भगवंत मान पर भरोसा जताया है।
आप ने इस बार जालंधर संसदीय क्षेत्र के उन हलकों में भी बढ़त हासिल की है, जिनमें एक साल पहले विधानसभा चुनाव में उसे हार मिली थी। 2024 आम चुनाव से पहले यह जीत आप के लिए नई ऊर्जा का काम कर सकती है। सरकार के बिजली बिल माफी जैसे फैसलों का असर भी इस चुनाव में असर दिखा है। जालंधर लोकसभा के तहत पांच ग्रामीण हलकों में आप को जीत मिली।
कैप्टन व जाखड़ नहीं कर पाए कमाल
कांग्रेस से भाजपा में आए पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ भी उपचुनाव में भाजपा की जमानत नहीं बचा सके। पार्टी के उम्मीदवार के प्रचार के लिए छह केंद्रीय मंत्री व दिग्गज जालंधर में एक माह बैठे रहे। गुजरात के पूर्व सीएम विजय रूपाणी, हरदीप पुरी, सोमप्रकाश, स्मृति इरानी, गजेंद्र शेखावत, जतिंदर सिंह, वीके सिंह और हंसराज हंस समेत कई दिग्गज नेता जालंधर उपचुनाव के प्रचार में उतारे गए थे। कैप्टन अमरिंदर व जाखड़ भी मैदान में रहे, लेकिन भाजपा पंद्रह फीसदी मत ही ले सकी। साफ है कि पंजाब में किसान बिलों के विरोध में नाराजगी को भाजपा अभी दूर नहीं कर पाई है।
अकाली दल-बसपा गठबंधन भी सफल नहीं
पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार ने जालंधर में दो लाख से अधिक मत ले गए थे। इस बार अकाली दल साथ मिलकर लड़ा, लेकिन गठबंधन को 1 लाख 58 हजार मत ही मिले। यानी 2019 के मुकाबले में भी कम। लिहाजा, बसपा का कैडर व वर्कर ने खुलकर इस गठबंधन को स्वीकार नहीं किया है। अकाली दल को भी उतने वोट नहीं मिले, जितनी उम्मीद थी। नौ हलकों में सिर्फ नकोदर में ही अकाली दल दूसरे स्थान पर रहा है। भाजपा-शिअद गठबंधन के टूटने से दोनों दलों को नुकसान हुआ है।