-लंबी सेवा दे रहे होम गार्ड कर्मियों के नियमितीकरण नीति बनाने का सरकार को आदेश
-छह महीने के भीतर याची के पक्ष में उचित आदेश जारी करें अन्यथा वह स्वत: नियमित माने जाएंगे
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में पंजाब सरकार को निर्देश दिया है कि वह लंबे समय से सेवाएं दे रहे होमगार्ड कर्मियों के नियमितीकरण पर नीति बनाएं। जस्टिस जगमोहन बंसल की एकल पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति दिन का कुछ हिस्सा या महीने के कुछ दिन किसी अन्य कार्य के साथ सेवा करता है तो उसे स्वयंसेवक कहा जा सकता है लेकिन जो व्यक्ति लगातार तीन दशक तक पूरा समय कार्य करता रहा है उसे स्वयंसेवक नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह अन्यायपूर्ण और अनुचित होगा यदि अन्य विभागों के क्लास तीन और क्लास चार कर्मचारियों को दस वर्ष की सेवा के बाद नियमित किया जाता है जबकि होमगार्ड कर्मियों को यह लाभ सिर्फ इसलिए न दिया जाए कि वे स्वयंसेवक हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि स्वैच्छिक सेवा का अर्थ यह है कि व्यक्ति बिना किसी प्रतिफल के सेवा दे लेकिन ऐसे देश में जहां रोजगार की कमी और गरीबी व्याप्त है यह मानना कठिन है कि कोई व्यक्ति तीन दशक तक पूरा समय बिना पारिश्रमिक के काम करेगा। याचिकाकर्ता को कांस्टेबल के वेतनमान के बराबर वेतन और अन्य भत्ते मिल रहे थे इसलिए यह कहना गलत होगा कि उसकी नियुक्ति बैकडोर एंट्री थी।
यह मामला दो याचिकाकर्ताओं से जुड़ा था जिन्हें 1992 में पंजाब सरकार की ओर से होमगार्ड/स्वयंसेवक के रूप में भर्ती किया गया था। उनमें से एक याचिकाकर्ता गुरपाल सिंह 1992 से 2025 तक ड्राइवर के रूप में कार्यरत रहा। उसने सेवा नियमित करने की मांग को लेकर यह याचिका दायर की थी। जस्टिस बंसल ने कहा कि याचिकाकर्ता की सेवा में कोई अंतराल नहीं रहा और न ही किसी कोर्ट का कोई अंतरिम आदेश उसके पक्ष में था। इसका अर्थ है कि उसने बिना किसी रुकावट के तीन दशक तक पूरी निष्ठा से काम किया। वह फुल-टाइम ड्राइवर/गनमैन के रूप में कार्य कर रहा था इसलिए यह कहना कि वह किसी अन्य काम में लगा था व्यावहारिक नहीं है। राज्य सरकार की इस दलील को कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया कि यह सेवा स्वैच्छिक है और नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता।
स्वयंसेवक की अवधारणा का गलत अर्थ लगाया
हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार ने स्वयंसेवक की अवधारणा का गलत अर्थ लगाया है और उसे दुरुपयोग किया है। कोर्ट ने एक याची हरदेव सिंह को पांच लाख की एकमुश्त राशि देने के आदेश दिए क्योंकि उन्हें सेवानिवृत्ति के समय न तो ग्रेच्युटी मिली, न पेंशन। कोर्ट ने आदेश दिया कि अन्य याचिकाकर्ता गुरपाल सिंह की सेवा छह माह के भीतर नियमित की जाए। यदि इस अवधि में आदेश जारी नहीं किया जाता, तो उसे उक्त अवधि पूरी होने पर स्वत: नियमित माना जाएगा।