अशांत खड़ी देश इराक से बटाला के चार युवक किसी प्रकार सही-सलामत घर लौट आए। उनके घर लौटने पर ग्रामीणों और परिजनों में खुशी की लहर दौड़ गई। इराक से लौटे युवकों ने कहा कि यहां आकर उन्हें नई जिंदगी मिली है।
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उन्होंने जब इराक में जारी खून-खराबे का आंखों देखा मंजर बयां किया तो परिजन और रिश्तेदारों के आंसू छलक पड़े। इन युवकों की घर वापसी से क्षेत्र के गांव सलोचाहल, तलवंडी पर्थ, नत्त और बालेवाल के लोगों ने राहत की सांस ली है।
गांव तलवंडी भरथ के रहने वाले प्रहलाद सिंह, गांव सलोचाहल के शमशेर सिंह, गांव नत्त के सतनाम सिंह और गांव बालेवाल के जसवंत सिंह ने यहां आकर अपने देश की माटी का तिलक लगाया। उन्हें इस बात का मलाल नहीं है कि वे खाली हाथ लौटे, बल्कि उन्हें इस बात का सब्र है कि वे सलामत अपने घर लौट सके।
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इराक में सभी की जान पत्ते पर : शमशेर
गांव सलोचाहल के रहने वाले शमशेर सिंह ने बताया कि इराक में पैदा हुए माहौल ने वहां के वातावरण को खराब कर दिया है। हर दिन इराक में बंमबारी होती रहती है। किसी को नहीं पता कि कब मौत उन्हें अपना शिकार बना लेगी।
शमशेर ने बताया कि इराक में सरकारी तंत्र प्रभाव हीन हो चुका है। ऐसे में वहां रहने वाले लोगों की मदद भला क्या करेगी। पिछले दो महीनों से वे अपना जीवन कैसे व्यतीत कर रहे थे, यह सिर्फ उन्हें ही पता है।
शमशेर ने बताया कि पिछले साल फरवरी में जब वह नौकरी करने इराक गया तभी से वहां का माहौल खराब है। जिस कंपनी में वह काम करता था, उनके अधिकारियों का व्यवहार भी भारतीयों के प्रति अच्छा नहीं है।
कंपनी की ओर ने उन्हें परेशान किया जाता था। यहां तक कि पिछले कुछ दिनों से उन्हें न तो उनको पेटभर खाना दिया जाता था और न ही उनको वेतन मिल रहा था।
पिछले एक महीने से वह कंपनी पर जोर डाल रहे थे कि उन्हें उनके घर भेजा जाए, उनकी मगर कंपनी ने उनकी एक न सुनी । इस बार जब उन्हें घर आने का मौका मिला तो कंपनी ने उनका वेतन भी नहीं दिया।
इराक जाना सबसे बड़ी भूल : सतनाम
इराक से अपने गांव नत्त पहुंचे सतनाम सिंह ने बताया कि रोजी-रोटी के लिए इराक जाना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। बताया कि इराक में काम करने गए सभी भारतीय परेशान हैं। कंपनी ने सिर्फ उनको भारत लौटने का टिकट उपलब्ध कराया।
पिछले छह महीने से उन्हें कोई भी वेतन नहीं मिला। उनके परिवार में अब खुशी की कोई सीमा नहीं है। उनके सलामत वापस लौटने की दुआएं की जा रही थीं। ऐसा लगता है मानो परिजनों की दुआ कबूल हो गई हो। उन्होंने बताया कि जो भारतीय नागरिक इराक में हैं वे पूरी तरह से असुरिक्षत हैं।
इराक में फंसे भारतीय असुरक्षित : प्रहलाद
गांव तलवंडी भरथ के रहने वाले प्रहलाद सिंह ने बताया कि वह शनिवार देर रात इराक से वापस लौटा। गांव पहुंचकर उसकी खुशी का कोई टिकाना नहीं रहा। प्रहलाद ने बताया कि वह दो फरवरी 2013 को इराक गया था। उस समय वहां का माहौल ठीक था ।
मगर कुछ समय के बाद माहौल खराब हाने के बाद कंपनी से उन्हें बाहर जाने की आज्ञा नहीं थी। वह कंपनी के अंदर ही डरे और सहमे रहते थे। उसकी कपंनी के अभी 25 युवक अभी भी असुरक्षित हैं। उसने पंजाब सरकार से अपील की है कि जल्द से जल्द इराक में रहने वाले भारतीयों की वापसी सुनिश्चित करे।
उसने बताया कि कंपनी द्वारा देश वापसी के लिए टिकट उपलब्ध न कराए जाने से दुखी होकर उनके साथ रहने वाले एक युवक ने जहरीली गोलियां भी निगल ली थी। देश लौटने तक उसे कई परेशानियों का सामना करना पड़ा।
कैदियों की तरह जी रहे इराक में फंसे भारतीय
गांव बालेवाल के रहने वाले जसवंत सिंह ने यहां लौटने के बाद बताया कि वह एक इराकी कंपनी में कारपेंटर के रूप में काम करने गया था। बताया कि बगदाद में आत्मधाती हमले होते ही रहते हैं।
जसवंत ने बताया कि पिछले कई दिनों से काम ठप पड़ने के कारण उन्हें वेतन नहीं मिल रहा था। फिर भी कपंनी वाले उन्हें वापस भेजने को तैयार नहीं थे। जसवंत ने बताया कि इराक में मौजूद भारतीयों की दशा कैदियों की तरह है।
वह कंपनी से बाहर आ-जा नहीं सकते थे । वहां पर फंसे लोगों की कोई मदद नहीं हो रही। जसवंत सिंह को इस बात से दुख है कि वह इराक में कमाई करने के लिए गया था, मगर वहां से खाली हाथ ही लौटा है।
इराक में फंसे भारतीयों के साथ कंपनियों द्वारा किए जा रहे सुलूक की एक लोमहर्षक कहानी सामने आई है। अमर उजाला के हाथ लगे एक वीडियो में हिमाचल के ऊना जिले का निवासी सन्नी बता रहा है कि ऊना के ही हरोली गांव का राम सिंह उर्फ रामदास भी उनके साथ है।
उसने बताया कि राम सिंह की बेटी की दो दिन पहले ऊना में मौत हो गई थी। परिजनों ने राम सिंह को बताया कि इराक में आतंकवाद की खबरों को लेकर वह बहुत परेशान थी और रोज ही वहां के हालात की खबरों से उसे तनाव बढ़ता जा रहा था। सन्नी ने बताया कि इसी तनाव के चलते राम सिंह की बेटी की मौत हो गई।
सन्नी के मुताबिक राम सिंह ने कंपनी से बेटी की मौत के चलते उसके संस्कार के लिए गांव जोने को छुट्टी मांगी तो कंपनी ने नहीं दी। इस पर उसने पासपोर्ट मांगा ताकि वह अपने खर्च पर काम छोड़ कर वापस जा सके लेकिन कंपनी ने उससे भी इंकार कर दिया।