फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'हाथी ने पहना चश्मा' बोला- लुटेरे जाएंगे और कमेरे आएंगे, ऐसे खेला गया ये बड़ा सियासी दांव

Fri, 20 Apr 2018 09:50 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
इनेलो और बसपा ने मिलाया हाथ
विज्ञापन
लोकसभा चुनाव 2019 से पहले बहुत बड़ा सियासी दांव खेला गया है। दरअसल, 'हाथी ने चश्मा' पहन लिया है और विरोधियों को ललकारा है। हुआ यूं कि हरियाणा में इनेलो और बसपा लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए एक नाव में सवार हो गए हैं। प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोकदल और बहुजन समाज पार्टी ने आपस में चुनावी गठबंधन कर लिया है।
विज्ञापन


बुधवार को यहां एक पांच सितारा होटल में गठबंधन की घोषणा की गई। इसके साथ ही दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर कई दिनों से चली आ रही अटकलों पर विराम लग गया है। दोनों दल लोकसभा और विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ेंगे। सीटों का बंटवारा चुनाव के समय ही किया जाएगा। नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला और बसपा के पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व चंडीगढ़ के प्रभारी डॉ. मेघराज ने संयुक्त प्रेस वार्ता में इस राजनीतिक गठबंधन की घोषणा की।

दोनों दलों के बीच गठबंधन की राजनीति नई नहीं है। इससे पहले 1998 में भी इनेलो-बसपा गठबंधन मिलकर चुनाव लड़ चुका है। इनेलो के चश्मे को बसपा के हाथी के रूप में नया साथी प्रदेश में मिलने पर अन्य सभी राजनीतिक संभावनाओं पर अब विराम लग गया है। इनके गठबंधन को मद्देनजर रखते हुए ही अब भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों को अपनी चुनावी बिसात बिछानी होगी। चूंकि, इनेलो-बसपा गठबंधन से जाटों, किसानों, पिछड़ों और दलितों का मजबूत गठजोड़ बना है।
विज्ञापन


 

गठबंधन ने दिए दो नए नारे

बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala
गठबंधन के साथ दोनों दलों ने मिलकर नए नारे भी दे दिए हैं। भाजपा की ओर इशारा करते हुए चौटाला व मेघराज ने कहा कि अब लुटेरे जाएंगे और कमेरे आएंगे। इसके साथ ही ‘अब समय है बदलाव का। दलित, पिछड़े और किसान मिलकर बनाएंगे नई पहचान। अब समय है बदलाव का’ नारा भी दिया है।

इससे इनेलो-बसपा की रणनीति भी साफ हो गई है कि वे दलितों, पिछड़ों और किसानों को धुरी बनाकर ही चुनावी दंगल में कूदेंगे। इस दौरान इनेलो प्रदेशाध्यक्ष अशोक अरोड़ा, पूर्व सीपीएस रामपाल माजरा, आरएस चौधरी, एमएस मलिक, बीडी ढालिया व प्रवीण आत्रेय, बसपा के वरिष्ठ नेता नरेश सारन, बसपा पूर्व विधायक व डिप्टी स्पीकर अकरम खान, डॉ. बलदेव, रामेश्वर और नेत राम इत्यादि मौजूद रहे।

अभय बोले, यह भाई-बहन का गठबंधन
नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला ने कहा कि आज परशुराम जयंती है। साथ ही अक्षय तृतीय का त्योहार भी। इस दिन शादियों के लिए ब्राह्मण से मुहूर्त की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे पवित्र मौके पर इनेलो और बसपा का गठबंधन हुआ है। यह केवल इनेलो और बसपा का राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि भाई-बहन का गठबंधन है। रक्षाबंधन जितना पवित्र ही यह गठबंधन है। कुमारी मायावती हमारी बहन हैं। इसलिए यह राजनीतिक के साथ सामजिक गठबंधन भी है। यह देश और प्रदेश को कांग्रेस और भाजपा मुक्त बनाने के लिए हुआ है।

तीसरे मोर्चे की भूमिका निभाएगा गठबंधन : चौटाला

इनेलो नेता अभय चौटाला
चौटाला ने कहा कि देशहित में यह गठबंधन तीसरे मोर्चे की भूमिका निभाएगा। इसकी अगुवाई बहन मायावती करेंगी। तीसरे मोर्चे को मुजबूत करने के लिए दोनों दल अपने राजनीतिक सहयोगी और समान विचारधारा वाले दलों से बातचीत करेंगे। अतीत में भी यह गठबंधन बदलाव का कर्णधार रहा है। एक बार फिर हरियाणा में इस बदलाव की नींव रखी गई है और निश्चित रूप से अगले लोकसभा चुनाव में मायावती के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा सरकार बनेगी।

इसलिए पड़ी गठबंधन की जरूरत
इनेलो के वरिष्ठ नेता अभय चौटाला ने कहा कि इस गठबंधन की जरूरत इसलिए पड़ी, चूंकि भाजपा ने प्रदेश को जात, धर्म और वर्गों में बांटने का काम किया है, जिसकी वजह से प्रदेश तीन बार जल चुका है। अब बदलाव का वक्त है। अब दलित, पिछड़ा और किसान हरियाणा प्रदेश की नई पहचान बनाने का काम करेंगे।

जेल भरो आंदोलन में इनेलो-बसपा, साथ-साथ
बसपा प्रदेश प्रभारी डॉ. मेघराज ने कहा कि एसवाईएल के पानी को लेकर बसपा पहली मई को होने वाले ‘जेल भरो आंदोलन’ में इनेलो का साथ देगी। हर जिले में बूथ स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता एक साथ काम करेंगे। भाजपा ने प्रदेश में जिस भाईचारे को तोड़ने की कोशिश की है अब इनेलो और बसपा फिर से उसे मजबूती प्रदान करने का काम करते नजर आएंगे।

ओपी चौटाला-मायावती को साथ लाने की अभय ने बिछाई बिसात

इनेलो नेता अभय चौटाला
हरियाणा को एक सांसद और पांच विधायक दे चुकी बहुजन समाज पार्टी के साथ मुख्य विपक्षी दल इनेलो ने गठबंधन कर बड़ा सियासी दांव खेला है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में यह साथ कितना कारगर सिद्घ होगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इनेलो-बसपा ने एक-दूसरे का हाथ थामकर विरोधियों को सकते में डाल दिया है। इस सियासी बिसात को बिछाने में सबसे अहम कड़ी नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला रहे।

बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर उन्हें बधाई देने चौटाला का जाना ही गठबंधन की राह पर आगे बढ़ने का संकेत था, मगर पत्ते खोलने से इनेलो और बसपा दोनों ने गुरेज किया। गठबंधन को लेकर इनेलो सुप्रीमो व पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला और बसपा सुप्रीमो एवं पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के मन में कुछ शंकाएं भी थीं। जिन्हें मिटाने में बड़ी भूमिका अभय ने ही निभाई।

उन्होंने ओपी चौटाला और मायावती से मुलाकात कर गठबंधन को न केवल समय की जरूरत बताया, बल्कि वर्तमान राजनीति हालात समझाने में भी वह सफल रहे। दलितों, किसानों और कमेरे वर्ग के आंदोलनों और एससी-एसटी एक्ट के कमजोर होने की दलीलें भी अभय ने दीं। इससे दोनों तरफ से आनाकानी की संभावनाएं खत्म हो गईं और गठबंधन का रास्ता साफ हुआ।

जिस सोच और रणनीति के तहत गठबंधन हुआ है, अगर वह कारगर बैठी और जाट, दलित, पिछड़ा वर्ग और किसान साथ आए तो बाकि राजनीतिक दलों के चुनावी समीकरण बिगड़ने में देर नहीं लगेगी। अभी इनेलो के 19 विधायक हैं, जबकि एक अकाली विधायक का भी उन्हें समर्थन है। 1998 में दो दशक पहले बसपा और इनेलो का गठबंधन रह चुका है और 2009 में हजकां के साथ गठबंधन टूटा है।

17 आरक्षित सीटों पर निगाहें

अभय चौटाला
हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में 17 आरक्षित (रिजर्व) हैं। इन सीटों पर पार्टी का खास फोकस रहने वाला है। बसपा के हरियाणा-पंजाब व चंडीगढ़ के प्रभारी तथा उत्तर प्रदेश में मंत्री रहे डॉ. मेघराज, हरियाणा के संयोजक प्रभारी नरेश सारन तथा प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारती के बीच हाल ही में विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर मीटिंग भी हुई है। रिटायर्ड आइएएस एवं पूर्व मंत्री कृपा राम पूनिया की बसपा में एंट्री को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

चौटाला के सहयोग से पहले एमपी बने थे नागरा
बहुजन समाज पार्टी और इनेलो के बीच राजनीतिक गठबंधन के चलते 1998 में एक सांसद चुनकर आ चुका है। तब अंबाला लोकसभा सीट से अमन नागरा सांसद बने थे। नागरा हरियाणा से बसपा के पहले और आखिरी सांसद रहे हैैं। नागरा बसपा की कमान भी संभाल चुके हैैं।
बॉक्स

1991 से 2014 तक पांच विधायक जीतकर आए
1991 से लेकर 2014 तक विभिन्न चुनावों में बसपा का कोई न कोई विधायक चुनकर आता रहा है। हालांकि इनमें से कोई दोबारा चुनकर नहीं आया। 1991 में सुरजीत सिंह नारायणगढ़ हलके से पहले विधायक चुने गए। फिर 2000 में जगाधरी हलके से बिशन सिंह सैनी, 2005 में छछरौली हलके से अर्जुन सिंह गुर्जर तथा 2009 में छछरौली से ही चौ. अकरम खान विधायक चुने गए, वह पूर्व हुड्डा सरकार में डिप्टी स्पीकर भी रहे। 2014 में पृथला हलके से टेकचंद शर्मा बसपा के विधायक बने। दिलचस्प बात यह भी कि बसपा से जीते विधायक जो भी दल सत्तारूढ़ रहा उसके समर्थन में रहे।
विज्ञापन

जाटों के लिए आरक्षण, दलितों-पिछ़डों को उत्पीड़न मुक्त माहौल से लुभाएंगे

इनेलो नेता अभय चौटाला
हरियाणा में इनेलो का जाटों में खासा जनाधार माना जाता है। जाट आरक्षण के लिए आंदोलनरत हैं। प्रदेश सरकार पर वह वादाखिलाफी का आरोप लगाते आ रहे हैं। इनेलो उन्हें आरक्षण दिलाने के साथ ही अन्य मांगें पूरी करने का आश्वासन देकर अपने पाले में लाने की तैयारी में है। चूंकि, पूर्व हुड्डा सरकार ने भी जाटों को अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम समय में जाट आरक्षण दिया था, जिस पर हाईकोर्ट में स्टे हो गया। पूर्व हुड्डा सरकार के समय स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पेश की गई, हुड्डा समिति के चेयरमैन थे।

लेकिन, लागू नहीं हो पाई। भाजपा इस मुद्दे पर सत्ता में आई, लेकिन चार वर्ष में इसे लागू नहीं कर सकी। किसान आंदोलनरत है और इनेलो उसे इसे लागू करने का आश्वासन देती आ रही है। दलितों और पिछड़ों पर उत्पीड़न के मामले बढ़ने के आरोप नई बात नहीं है। एससी-एसटी एक्ट के कमजोर होने से दलित वर्ग वैसे ही भाजपा से नाराज चल रहा है। बसपा के साथ आने से दलितों को साथ लाने में इनेलो को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। साथ ही इनेलो-बसपा सत्ता में आने पर दलितों और पिछड़ों को उत्पीड़न मुक्त वातावरण देने की हामी भी भर रहे हैं।

हरियाणा में जातीय समीकरण
. ओबीसी - 17 फीसदी-अहीर, यादव, सैनी, गुजर और जांगड़ा ब्राह्मण शामिल।
. दलित - 22 प्रतिशत, वाल्मीकि सहित
. जाट - 49 प्रतिशत - साढ़े सात फीसदी मुस्लिम मूला जाट को छोड़कर
. सामान्य जातियां -13 प्रतिशत - ब्राह्मण, बनिया, राजपूत, अग्रवाल, पंजाबी शामिल
. मुस्लिम - 8 प्रतिश। साढ़े सात प्रतिशत मूला जाट सहित।
. आदिवासी -0.3 प्रतिशत
. अन्य -0.4 प्रतिशत। जैन व इसाईयों सहित।

इनेलो और बसपा का बीते चुनाव में वोट प्रतिशत
इनेलो ने 2014 के विधानसभा चुनाव में 24 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि बसपा ने 4.37 फीसदी। इनेलो सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटें जीतीं, जबकि बसपा ने 87 सीटों पर चुनाव लड़ा और एक ही जीत पाई।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें