पंजाब के नशा मुक्ति केंद्रों की हालत ठीक नहीं है। प्राइवेट केंद्रों में नशा छुड़ाने की आड़ में युवकों को यातनाएं दी जा रही हैं। उन्हें पीट-पीटकर नशे से दूर रखा जा रहा है।
विज्ञापन
इंडियन रेड क्रॉस से संचालित केंद्र में एक महीने में युवकों को नशे से आजादी दिलाई जा रही है, जबकि उसके विपरीत निजी केंद्रों में छह महीने तक युवकों को रखा जाता है।
मरीज इलाज से भी संतुष्ट नहीं है। ये हाल दोनों ही केंद्रों का है। ये खुलासे लुधियाना स्थित दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हास्पिटल (डीएमसी) के कम्युनिटी मेडिसिन डिपार्टमेंट की एक स्टडी में सामने आया है।
विज्ञापन
बेड की बजाय जमीन पर सुलाया जाता है
विभाग ने दोनों ही केंद्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया है। इसमें सरकारी और निजी दोनों ही केंद्रों को शामिल किया गया है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि प्राइवेट केंद्रों से रेडक्रॉस के केंद्र बहुत हद तक ठीक हैं।
अध्ययन के अनुसार नशा छुड़ाने के बाद निजी केंद्र अपने मरीजों का कोई फॉलोअप नहीं करते, जबकि रेडक्रॉस लगातार उनके घर पर जाकर मरीजों का हाल पूछती है।
मरीजों को बेड के बजाए जमीन पर सुलाया जा रहा है। स्टडी के मुख्य ऑर्थर डीएमसी असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विक्रम कुमार गुप्ता है।
सबसे ज्यादा नशेड़ी शिक्षित और शादीशुदा
स्टडी में रोचक तथ्य यह भी सामने आया है कि नशे के सबसे ज्यादा आदी शादीशुदा और शिक्षित हैं। अध्ययन में जिन मरीजों को शामिल किया गया है, उनमें से 72.5 मरीज शादीशुदा, जबकि 18.1 प्रतिशत मरीज कुंवारे हैं।
करीब 9.4 प्रतिशत मरीज परिवार से अलग रहते हैं या फिर तलाकशुदा हैं। करीब 36.3 प्रतिशत मरीज हायर सेकेंडरी तक पढ़े हैं। 18.43 प्रतिशत मिडिल क्लास, जबकि 13.53 प्रतिशत मरीज सिर्फ प्राइमरी तक पढ़े हैं। 5.64 प्रतिशत ग्रेजुएट, 3.4 प्रतिशत पोस्ट ग्रेजुएट, जबकि 10.9 प्रतिशत अनपढ़ हैं।
ये कदम तत्काल उठाए जाने चाहिएं
1. हर ड्रग सेंटर में कम से कम 15-30 बेड होने चाहिए। 2. फीमेल मरीजों के लिए अलग से वार्ड होना चाहिए। 3. सभी सेंटर की पोस्ट को जल्द से जल्द भरना चाहिए। 4. सभी केंद्रों को रेगुलर चेक करना चाहिए, ताकि मानवाधिकारों का हनन न हो। 5. गरीब मरीजों के लिए मुफ्त इलाज का प्रावधान होना चाहिए। 6.केंद्रों का प्रोजेक्ट डायरेक्टर कम से कम मेडिकल प्रोफेशन से जुड़ा होना चाहिए।
ये सब हो यह रहा है
1. मरीजों को बेड के बजाए चटाई पर लिटाया जा रहा है। 2. प्राइवेट केंद्रों में छह महीने तक रखा जा रहा है। 3. प्राइवेट केंद्रों के स्टाफ मरीजों को बांध कर पीटते हैं। 4. प्राइवेट केंद्र अपनी ही गाइडलाइंस पर काम रहे हैं। 5. केंद्रों में न तो कोई नर्स है और न ही काउंसलर। 6. केंद्रों में प्रशासन की ओर से कोई भी निरीक्षण नहीं किया जा रहा है।
पंजाब के नशा मुक्ति केंद्रों के हालात ठीक नहीं हैं। मरीजों से बात करने पर ही सच्चाई सामने आई है। प्रशासन को जल्द से जल्द ठोस कदम उठाने चाहिए। डॉ. विक्रम कुमार गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर दयानंद मेडिकल कॉलेज लुधियाना