डा. प्रभाजोत परमार
ऐसे खतों पर वर्ष 2004 से रिसर्च कर रहीं डा. प्रभजोत परमार ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि आज भी ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन में ऐसे काफी संख्या में पत्र पड़े हैं। ये उर्दू, गुरुमुखी, बंगाली व मराठी में हैं। तीनों चरणों के खतों का अंग्रेजों ने बाकायदा अंग्रेजी अनुवाद करवाकर वहां सहेज कर रखा हुआ है। ये खत बहुत ही भावुक होते थे।
कुछ खतों के मजमून जो कभी घर नहीं पहुंचे
- एक जवान ने मोर्चे से लिखा, कि हमें यहां बहुत मारा-पीटा जाता है, हालात बहुत खराब हैं। घर से किसी को भी फौज में भर्ती मत होने देना।
- एक अन्य जवान ने लिखा- हमारे साथ यहां भेड़-बकरियों से भी ज्यादा बुरा सुलूक किया जा रहा है। उसको हम बता नहीं सकते।
- हम घायल हो रहे हैं। तीन महीने से अस्पताल में हैं। बाहर आने तक की इजाजत नहीं है। पता नहीं कब लौटेंगे।
- मुझे गोली लगी है, सोचा था शायद वापस आ जाऊंगा, लेकिन इलाज के बाद मुझे दोबारा मोर्चे पर भेजा जाएगा, मन बहुत उदास है
- युद्ध में हमारे कई साथी मारे जा चुके हैं, बहुत से घायल हैं। मालूम नहीं जिंदा लौटूंगा या नहीं।