इसी रिसर्च टीम ने भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी लार्ज स्केल मैपिंग ऑफ भूस्खलन पर भी काम किया है। इस टीम ने 43 प्वाइंट देखे। उसके बाद निर्णय दिया कि 22 प्वाइंट पर खतरा है। यहां भूस्खलन नहीं रुकने वाला है। वहां से आबादी को दूर रखा जाए, यही बेहतर है। यह स्थान उत्तराखंड के अलकनंदा नदी के पास एनएच-58 कलियासोर मंदिर के पास है। यहां 150 साल से भूस्खलन हो रहा है। टीम ने सरकार को सुझाव दिया है कि यहां केवल पुल बनाकर ही रास्ता डायवर्ट किया जाए या बाईपास बनाया जाए।
यहां भूस्खलन रुकने वाला नहीं है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि यहां पूर्व में फाल्ट लाइन मिलने के कारण भूकंप आया था और उसके कारण मिट्टी, पत्थर चूरा बन गया, जो भूस्खलन का रूप ले गया। इसी तरह हरियाणा के उमरी गांव के पास मोरनी हिल में 2011 से भूस्खलन तेज हो गया। आसपास के घरों में भी दरारें आ गई हैं। यहां भी फॉल्ट लाइन है। उधर, हिमाचल प्रदेश के शिमला के पास ढल्ली टनल का भूस्खलन भी नहीं रुक सकता। यहां भी बड़ा खतरा है। जनता को दूर रखने की सलाह दी है।
चार संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इन प्रदेशों में जाकर फॉल्ट लाइनें खोजी हैं। इसी लाइन के कारण भविष्य में यहां कभी भी भूकंप आ सकता है। साथ ही भूस्खलन भी कई जगह रुकने वाले नहीं हैं। उसका कारण भी फॉल्ट लाइनों का मिलना है। इसकी रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी है।
- डॉ. महेश ठाकुर, भूगर्भ विज्ञान विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय