1968 में एयरफोर्स के एन-12 (बीएल-534) को टास्क मिला था कि 97 जवानों को लेह में छोड़कर आना है। चंडीगढ़ एयरबेस से इस विमान ने जवानों को लेकर उड़ान भरी। लेकिन लेह में अचानक बादल घिर आए और मौसम बेहद खराब हो गया। पायलट को तुरंत प्रभाव से विमान वापस चंडीगढ़ लाने को कहा गया।
विमान जब लेह से वापस चंडीगढ़ आ रहा था तो अचानक रोहतांग दर्रे के ढाका ग्लेशियर के पास गायब हो गया। उसके बाद कई सर्च ऑपरेशन चलाए गए, लेकिन सिर्फ 5 जवानों के शव ही मिले। बाकी न तो जवान मिले और न ही जहाज का मलबा।
सेना ने इन अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है कि जवानों के साथ वापस लौट रहा विमान दुश्मन के इलाके में चला गया है। यह बात जोरों से फैलाई गई थी कि खराब मौसम के चलते एन-12 भटक गया है और पाकिस्तान के प्रतिकूल क्षेत्र में लैंड कर गया था। वहां पाकिस्तान ने सभी जवानों को युद्धबंदी बना लिया था।
लेकिन चंद्रभागा-13 के युवा ट्रेकर्स की टीम को ढाका ग्लेशियर में लापता जवानों और जहाज की खोज करते वक्त एक जवान का पहचान पत्र मिला था और बाद में 5 शव भी मिल गए थे। अब 50 साल बाद फिर से इन जवानों को खोजने के सेना के प्रयासों से परिजनों में उम्मीद जगी है कि शायद उनके ‘अपनों’ का शव मिल जाए और वे उनका अंतिम संस्कार कर सकें।