इंडो पाक बॉर्डर पर बीएसएफ ने बढ़ाई सुरक्षा व्यवस्था
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भारत-पाकिस्तान सीमा पर अकसर तनाव रहता है। ऐसे में बॉर्डर से सटे गांवों के हालात कैसे हैं और कैसी है लोगों की जिंदगी। पंजाब के तरनतारन में भारत-पाक सीमा से महज 200 मीटर दूर बसा छोटा सा गांव कल्स। अधिकतर परिवार अपना सामान बांधकर रखते है। पता नहीं कब उन्हे गांव खाली करना पड़ जाए। जम्मू-कश्मीर में बार्डर पर जैसे ही तनाव बढ़ता है, तो इस गांव में भी एकदम दहशत का माहौल बन जाता है। बीएसएफ एहतिहातन इस गांव को तुरंत खाली करवाती है, क्योंकि ये गांव एकदम फेंसिंग से सटा है।
इसी वजह से पूरा गांव हर वक्त दहशत के साये में रहता है। गांव के सरपंच हरमंदिर सिंह व ग्रामीण सुरजीत सिंह, मेहर सिंह, सुखदेव सिंह, अजीत सिंह, गुरमेहर सिंह इत्यादि बताते हैं कि उनका गांव मुगलकालीन है और बंटवारे से पहले काफी खुशहाल था। लेकिन जब से बंटवारा हुआ है, तब से लेकर आज तक ग्रामीण दहशत में ही जी रहे हैं। आजादी से पहले गांव की आबादी करीब डेढ़ हजार थी, कुछ सीमा पार चले गए। आज गांव में 850 लोग रहते हैं और 575 लोगों को वोट का अधिकार है।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वे वोट तो देते हैं, लेकिन उसके बदले में उन्हे विकास नहीं मिलता। सिर्फ चुनावी मौसम में नेताओं के दर्शन होते हैं, उसके बाद तो सरकारें मुंह फेर लेती है। गांव के अधिकतर लोग आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। ग्रामीणों के पास थोड़ी-बहुत जमीन है, जिसमें से कुछ हिस्सा फेसिंग पार पाकिस्तान की तरफ है। जबकि गांव के अधिकतर युवा बेरोजगारी का शिकार हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि इसके अतिरिक्त सन 1965, 1971, 1999 के युद्ध और कुछ समय पहले हुई सर्जिकल स्ट्राइल के दौरान तो गांव में हालात खराब हुए थे। ग्रामीण कई-कई दिनों तक गांव से दूर अपने रिश्तेदारों के रहे। आज भी जैसे ही घाटी में हालात खराब होते ही उन्हे गांव खाली करना पड़ता है और इस दौरान लोगों को बहुत नुकसान होता है।
पीने को खारा पानी, गांव तक पहुंचना मुश्किल
इंडो पाक बॉर्डर पर गांव
- फोटो : अमर उजाला
पहले तो इस गांव में ही पहुंचना बहुत मुश्किल है। कोई सरकारी साधन नहीं। वाहन है तो ठीक, वरना खेमकरण सेक्टर से कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ेगा। उसके बाद गांव के कच्चे व धूलभरे रास्ते चलना मुश्किल कर देते हैं। बारिशों में हालात बद से बदत्तर हो जाते हैं। गांव में कोई सरकारी ट्यूबवैल नहीं, खारा पानी पीकर ग्रामीणों की जिंदगानी चलती है, लेकिन यही खारा पानी उनकी सेहत को बिगाड़ रहा। शोरे वाला पानी पीकर अमूमन बीमार रहते हैं बच्चे।
प्राइमरी स्कूल के हालात बहुत ही खराब, अधिकतर बच्चों को उच्च शिक्षा ही नसीब नहीं होती। गांव में गरीबी का भी जबरदस्त आलम हैं और कई लोग आज भी कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं। गांव में गंदगी का सम्राज्य है, नालियां हैं नहीं, गंदा पानी घरों के आसपास सड़कर बीमारियों को न्यौता दे रहा। गांव में कोई पंचायत घर, सामुदायिक भवन और स्ट्रीट लाइट सुविधा नहीं। शाम छह बजे के बाद कोई गांव से नहीं निकलता। गांव में कोई खेल का मैदान भी नहीं है।
इलाज गांव से दूर, कर्ज में डूबे किसान
ग्रामीणों ने बताया कि गांव में इलाज की भी कोई सुविधा नहीं है। इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। इमरजेंसी में तो जान आफत में आ जाती है। कई बार तो हालात बहुत बिगड़ जाते है। जबकि अधिकतर किसान कर्ज में भी दबे हैं और अब यहां के किसानों को कोई कर्ज भी नहीं देता। जिस वजह से गुजर-बसर बहुत मुश्किल हो रहा है। ग्रामीणों के अनुसार केंद्र व राज्य सरकार उनके गांव के लिए कुछ करें, वरना हालात दिन-ब-दिन बदत्तर हो रहे हैं।
ऐतिहासिक गांव, फिर भी सुध लेने वाला नहीं
ये गांव सिखों के तीसरे गुरु अमर दास जी से भी जुड़ा है। इसी गांव में माता मनसा देवी से गुरु अमर दास जी के लावां फेरे (विवाह) हुआ था। गुरु जी अमृतसर के गांव बासरके से अपनी बारात लेकर इस गांव में पहुंचे थे। उन्हीं की याद में यहां एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा है कि जहां हर साल बैसाखी पर और 25 व 26 जनवरी को भव्य जोड़ मेला भी लगता है, लेकिन इसके बावजूद भी इस गांव की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
दो मुल्कां विच खिंच गई लकीर, पर नहीं बदली साड्डी तकदीर
इंडो पाक बॉर्डर पर गांव
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‘मुल्क आजाद होया और वेखदे ही वेखदे दोनां मुल्कां विच एक लकीर खिंच गई, जिनू आज बॉर्डर कहदे हण..., लेकिन इस लकीर खिचण दे बरसों बाद वी अज तक साड्डी तकदीर नी बदली। हुण तां पता नी किन्ने दिन और जीणा है..., अपने पिंड (गांव) नू खुशहाल वेखणा चाहंदा हां..., पर सरकारां साड्डे वल नजरां ही नहीं करदी..., कोई तां सुणे साड्डा दुखड़ा, सानूं वी गांव दी तरक्की चाइदी ए...’
यह कहना हैं पंजाब स्थित भारत-पाक बार्डर फेंसिंग से महज आठ मीटर की दूरी पर बसे गांव सकत्तर में रहने वाले अस्सी वर्षीय गुलजार सिंह का। इसी तरह गांव में और भी कई बुजुर्ग हैं, जिन्होंने बंटवारे का दंश झेला, लेकिन अपना मुल्क नहीं छोड़ा। वे लोग इसी गांव में अपने परिवारों संग बसे रहे। आज भी ये लोग केंद्र और राज्य सरकार से यही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद कभी तो इन सरकारों का ध्यान उनके गांव की ओर जाएगा और दिन बहुरेंगें।
लेकिन आलम यह है कि आज तक तरक्की के नाम पर इस गांव में कुछ खास नहीं हुआ। पांच साल में सिर्फ एक बार नेता इस गांव में जरूर पहुंचते हैं, क्योंकि करीब एक हजार आबादी वाले इस गांव में 675 लोग वोट का अधिकार रखते हैं। उसके बाद कोई भी मुड़कर इस गांव में नहीं झांकता है।
गांव के बदतर हालात, रोती है जिंदगी
इंडो पाक बॉर्डर पर गांव
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गांव सकत्तर निवासी सुखचैन सिंह, दिलबाग सिंह, भगवान सिंह, निर्मल सिंह, साहब सिंह, हरजिंद्र सिंह, प्यारा सिंह, हरबंस सिंह, गुलजार सिंह, मेजर सिंह, मिल्खा सिंह, मंजीत सिंह, सतनाम सिंह, सरदूल सिंह व गुलजार सिंह ने बताया कि गांव के हालत इतने बदतर हैं कि यहां जीना मुश्किल है। उनके अनुसार आजादी के बाद सात दशक बीत गए, मगर गांव के हालात नहीं बदले।
ग्रामीणों ने सवाल खड़ा करते हुए कहा कि ‘क्या बॉर्डर पर बसे होना हमारी बदकिस्मती है, जो सरकारें कभी गांव की तरक्की के बारे में नहीं सोचती, दुश्मन की दहशत वैसे ही हमें सताती रहती है, ऊपर से लोगों की जिंदगी को रोजाना यहां ढेरों समस्याओं से दो-चार होकर रोती है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव में आज भी सभी गलियां कच्ची हैं, जहां-तहां गंदगी पसरी है। घरों का गंदा पानी बिना नालियों के कच्ची गलियों में से ही गुजरकर खाली जगहों पर इकट्ठा होकर सड़ रहा है। पीने के पानी के लिए कोई सरकारी ट्यूबवेल नहीं है।
खारे पानी पर जिंदगी चल रही है। इलाज के लिए कोई डिस्पेंसरी नहीं है। इमरजेंसी पड़ने पर लोग पंद्रह किलोमीटर दूर भिखीविंड जाते हैं। गर्भवती महिलाओं को इलाज के लिए बहुत ज्यादा दिक्कते झेलनी पड़ती हैं। यहां सरकारी स्कूल है, लेकिन खस्ता हाल में। इसमें टीचर सिर्फ एक है। जिस दिन वो छुट्टी पर चला जाए, उस दिन स्कूल की छुट्टी ही मानो। इस गांव तक पहुंचना भी बड़ा मुश्किल है। यातायात की कोई सरकारी सुविधा नहीं। अपना साधन न हो तो कई किलोमीटर पैदल गांव तक पहुंचना पड़ता है। गांव में बहुत से बुजुर्ग ऐसे हैं, जिनकी पेंशन तक नहीं लगी है, शहर जाकर धक्के खाने पड़ते हैं, इस लिए नाउम्मीद होकर गांव में ही बैठे हैं।