हरियाणा स्कूल शिक्षा बोर्ड इसी उलझन में पड़ा रहा कि दाखिला पहले और स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट (एसएलसी) बाद में कैसे बने। संबंधित स्कूल ने काफी दलीलें दीं, लेकिन बोर्ड की समझ में बात नहीं आई और उसने एक दसवीं और दो बारहवीं के बच्चों का रिजल्ट ही रोक लिया।
आखिरकार संबंधित स्कूल को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। जस्टिस आरके जैन ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि बच्चों के दाखिले में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है और बोर्ड की ओर से उनके दाखिले पर सवाल उठाना पूरी तरह गलत है। जस्टिस जैन ने कोर्ट की ओर से पूर्व में दिए गए सभी आदेशों पर रोक लगाते हुए शिक्षा बोर्ड को तुरंत तीनों बच्चों का रिजल्ट घोषित करने के आदेश जारी किए।
मामला महेंद्रगढ़ के सेहलांग स्थित बीआर आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल का है, जिसकी याचिका पर हाईकोर्ट ने उक्त फैसला सुनाया। इस स्कूल में पढ़ने वाली दसवीं की छात्रा गरिमा, बारहवीं में पढ़ने वाले विकास और मनीषा बाई को शिक्षा बोर्ड की ओर से दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा के लिए पंजीकृत किया गया था। तीनों विद्यार्थियों ने सितंबर 2014 को पहले सेमेस्टर में हिस्सा लिया और पास हो गए।
याचिकाकर्ता स्कूल ने इसके बाद दूसरे सेमेस्टर के लिए तीनों विद्यार्थियों के परीक्षा फार्म बोर्ड को भेजे, लेकिन फार्म देरी से भेजे जाने के कारण बोर्ड ने तीनों विद्यार्थियों को रोल नंबर जारी करने से इंकार कर दिया। इस पर स्कूल ने अपनी गलती मानते हुए बोर्ड से गुहार लगाई, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।
आखिरकार स्कूल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिस पर कोर्ट ने स्कूल पर तो लापरवाही के लिए 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया, वहीं तीनों विद्यार्थियों को राहत प्रदान करते हुए दसवीं और बारहवीं की वार्षिक परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी। संभवत: यह मामला यहीं खत्म हो जाता, लेकिन इसके बाद शिक्षा बोर्ड ने उक्त तीनों विद्यार्थियों के दाखिले में गड़बड़ी की आशंका जताते हुए तीनों की एनरोलमेंट से इंकार कर दिया।
बोर्ड का कहना था कि स्कूल रिकार्ड में इन तीनों बच्चों का एडमिशन नंबर और एनरोलमेंट रिटर्न के आवेदन का सीरियल नंबर अलग-अलग है। इस पर याचिकाकर्ता स्कूल की ओर से हाईकोर्ट में पेश किए गए रिकार्ड और दी गई दलीलों को अदालत ने सही पाया और बोर्ड द्वारा तीनों बच्चों के मामले में जारी फैसलों पर रद करते हुए उनका रिजल्ट घोषित करने के आदेश दिए।