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पति तो किसी ने पिता खोया, पर फर्ज की राह से मुंह नहीं मोड़ा

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चंडीगढ़। त्याग, सेवा और प्यार की प्रतिमूर्ति मानी जाने वाले नर्सिंग ऑफिसरों ने भी कोरोना काल में असहनीय दर्द और दु:ख झेला, लेकिन उन्होंने अपने दु:ख को फर्ज की राह का रोड़ा नहीं बनने दिया। पीजीआई, जीएमसीएच-32 और जीएमएसएच-16 में तैनात नर्सिंग ऑफिसरों की बदौलत कोरोना की पहली और दूसरी लहर में हजारों संक्रमित मरीजों की जान बचाई जा चुकी है, लेकिन वे अपनों को बचाने में किस्मत के आगे हार गई। इस बार अंतरराष्ट्रीय नर्सेज डे पर आप ऐसे नर्सिंग ऑफिसरों से रूबरू करा रहे हैं जिन्होंने कर्तव्य निभाने के मामले में एक मिसाल पेश की है। महामारी के दौरान उनमें से किसी ने अपने पति को खोया तो किसी ने पिता को। अपनों के संक्रमित होने पर भी उन्होंने ड्यूटी पर जाना बंद नहीं किया। ड्यूटी के दौरान किसी की गोद में पिता ने दम तोड़ा तो किसी की आंखों के सामने उसका सुहाग उजड़ा। इन सबके बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य से बेईमानी नहीं की। अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों के लिए ढाल बनकर खड़ी रहीं।
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कोविड में छूट गया सात जन्मों का साथ
जीएमएसएस-16 में 22 वर्षों से कार्यरत करमजीत कौर की खुशियां कोविड ने तहस-नहस कर दी। जिसके साथ सात जन्मों तक साथ जीने मरने की कसमें ली थीं, उनका साथ छूट गया। करमजीत और उनके पति रजनीश दूसरी लहर में संक्रमण की चपेट में आए थे। पहले रजनीश संक्रमित हुए। उस दौरान करमजीत उनकी देखभाल करते हुए ड्यूटी भी कर रही थीं क्योंकि आपातकाल के कारण सभी की छुट्टियां रद्द कर दी गई थीं, लेकिन रजनीश की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। उनकी देखभाल करते हुए करमजीत भी संक्रमित हो गईं। दोनों को जीएमएसएच-16 में भर्ती कराया गया लेकिन रजनीश 3 जून 2021 को जिंदगी की जंग हार गए। वे करमजीत और दो बच्चों को अकेला छोड़ गए। उस दौरान भी करमजीत ने हिम्मत नहीं हारी। पोस्ट कोविड तमाम तरह की शारीरिक और मानसिक परेशानियों को झेलने के बावजूद ड्यूटी पर लौटीं।
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बेटे की गोद में पिता ने तोड़ा दम
मुझे आज भी वो दिन याद है जब कोविड की दूसरी लहर के दौरान मेरे पापा अजीत मसीह मार्च 2021 में संक्रमित हुए। उनको घर पर आइसोलेशन में रखा था। उस दौरान भी मैं लगातार ड्यूटी कर रहा था लेकिन अचानक स्थिति गंभीर हो गई। जीएमसीएच-32 में उन्होंने मेरी गोद में आखिरी सांस ली थी। ये बातें बताते हुए जीएमसीएच-32 के नर्सिंग ऑफिसर विनय की आंखें नम हो गईं। विनय ने बताया कि जिस पिता के कंधे पर खेला था, जिसकी अंगुली पकड़कर चला था उसे अब न तो देख सकता हूं न हीं बात कर सकता हूं। इन सबके बावजूद अंतिम संस्कार के कुछ दिनों बाद फिर से ड्यूटी ज्वॉइन कर ली। हर पल यही प्रयास रहता था कि मैंने अपने पिता को खो दिया पर अब कोई और अपना कोई करीबी न खोने पाए।
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पापा ने सिखाया था फर्ज से बेईमानी मत करना
जीएमएसएच-16 की नर्सिंग ऑफिसर अमन कौर का कहना है कि मैं अपने पापा की परी थी। पापा सभी भाई-बहनों में सबसे ज्यादा मुझे प्यार करते थे। वे बचपन से हमें एक ही बात समझाते थे कि हमें अपने फर्ज से कभी बेईमानी नहीं करनी चाहिए लेकिन कोविड ने उन्हें मुझसे दूर कर दिया। दूसरी लहर के दौरान अमन के पिता सरदार इकबाल सिंह मई में संक्रमित हुए। अमन जिस आईसीयू में ड्यूटी कर रही थीं, वही उनके पिता को भर्ती किया गया। अमन बाकी मरीजों के साथ उनकी भी देखभाल कर रही थीं कि अचानक एक दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। आज भी अमन उसी आईसीयू में ड्यूटी कर रही हैं। जहां हर पल उन्हें पिता की दी हुई सीख याद आती है। अमन ने बताया कि अंतिम संस्कार का रस्म पूरा होने तक वे अवकाश पर रहीं। उसके बाद ड्यूटी पर लौट आईं क्योंकि अस्पताल में मरीजों का बहुत दबाव था। कर्मचारियों के संक्रमित होने से मानव संसाधन की बेहद कमी थीं।
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दीदी तुम बहुत याद आती हो... कौन बांधेगा राखी
जिस बहन ने हर पल मेरी सलामती की दुआ मांगी, इस महामारी में मैंने उसे ही खो दिया। अब कौन बांधेगा राखी और कौन मांगेगा मेरे लिए दुआ। यह कहना है पीजीआई के नर्सिंग ऑफिसर संदीप का। उजनकी बड़ी बहन राममूर्ति भी कोविड की दूसरी लहर के दौरान संक्रमित होकर हमेशा के लिए उन सभी से दूर हो गई। संदीप ने बताया कि पहले तो उनका राजस्थान में इलाज चला और स्थिति गंभीर होने पर पीजीआई लाया गया। यहां भर्ती होने पर मैं ड्यूटी के साथ उनकी देखभाल करता लेकिन स्थिति अनियंत्रित होती गई। आईसीयू में शिफ्ट होने के बाद मैं भी वहां पीपीई किट पहनकर रहता था। वहां भर्ती अन्य मरीजों की भी देखभाल करता था। दीदी के जाने के बाद चंद दिनों की छुट्टी ली और फिर से अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए ड्यूटी पर लौट आया।
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