बीमारी से जूझने का जज्बा हर किसी में नहीं होता। खासकर टाइप वन डायबिटीज जैसी बीमारी में। यह गंभीर इसलिए है, क्योंकि इसका फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है। जीने के लिए हर दिन कम से कम तीन से चार बार पेट में सुई जैसी सीरिंज को चुभाकर इंसुलिन लेनी पड़ती है।
एक बच्चे के लिए यह सब बहुत कठिन है, लेकिन आकृति कोहली ने इन सभी बाधाओं को पार कर साहस और संघर्ष की एक मिसाल पेश की है। बीमारी से जूझते-जूझते वह अब डायबिटीज एजुकेटर बन र्गई है। जीएमसीएच-32 में वह अब अपने जैसे बच्चों को इंसुलिन लेने के तरीके, डिप्रेशन से दूर रहने और डाइट के बारे में बताती है।
ओपीडी में आने वाले छोटे बच्चे आकृति की बातों को अच्छी तरह से समझते हैं। इससे फायदा यह हो रहा है कि बच्चे खेल-खेल में इंसुलिन लेना सीख रहे हैं। आकृति का कहना है जीएमसीएच-32 की डॉ. चंद्रिका, डॉ. यशदीप और पीजीआई के डॉ. संजय, राशि गोयल, लेखा मेहंदी और अनिल ने हर बार मनोबल बढ़ाया। इससे जीने की राह मिली और हौसला बढ़ा।
गंभीर बीमारी, फिर भी पढ़ाई में बेहतर
आकृति ने बताया कि जब वह क्लास वन में पढ़ती थी, तभी वह इस गंभीर बीमारी का शिकार हो गई। पहले तो पैरेंट्स ने समझा कि मीठा खिलाने से आकृति ठीक हो जाएगी, लेकिन उसकी तबियत लगातार खराब होती गई। बाद में जीएमसीएच में चेकअप कराने पर पता चला कि वह टाइप वन डायबिटीज से पीड़ित है।
पैरेंट्स को बताया गया कि उसे उम्र भर इंसुलिन लेनी पड़ेगी। इसके बाद पिता वीरेंद्र कोहली और मां सीमा कोहली के हौसले ने इस बीमारी से लड़ने का जज्बा दिया। गंभीर बीमारी से लड़ने के बावजूद पढ़ाई में अव्वल रही। दसवीं में 60 प्रतिशत अंक, बारहवीं में 78 प्रतिशत और ग्रेजुएशन में 60 प्रतिशत अंक मिले।
डिप्रेशन में चले जाते हैं बच्चे
पीजीआई और जीएमसीएच-32 के इंडोक्रिनोलॉजी डिपार्टमेंट के विशेषज्ञों का कहना है कि टाइप वन डायबिटीज होने के बाद बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। रोजाना उन्हें पेट के माध्यम से इंसुलिन लेनी पड़ती है और चॉकलेट, मिठाइयां, फास्ट फूड जैसी सभी पसंदीदा चीजों से दूर रहना पड़ता है।
बचपन में ही जब इस तरह के एहतियात बरते जाते हैं तो उन्हें लगता है कि वे दूसरों से अलग हैं। उनमें अकेलापन आता है और वे डिप्रेशन में चले जाते हैं। ऐसे बच्चों को संभालना बहुत मुश्किल होता है।
ऐसे होती है टाइप वन डायबिटीज
डॉक्टरों के मुताबिक, टाइप वन डायबिटीज होने के सही कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। टाइप वन डायबिटीज ऑटो इम्यून डिजीज है।
यह वायरस, प्रोटीन या मिल्क से भी हो सकती है। जब शरीर के अंदर इंसुलिन बनाने वाली सेल्स के खिलाफ एंटी बॉडीज बनने लगती हैं तो इससे शरीर में इंसुलिन बनना बंद हो जाती है।
इंसुलिन की जरूरत पूरी करने के लिए मरीज को बाहर से इंसुलिन लेनी पड़ती है। पूरे देश में करीब पांच लाख बच्चे टाइप वन डायबिटीज से पीड़ित हैं।
पीजीआई में करीब एक हजार बच्चे रजिस्टर्ड हैं, जबकि जीएमसीएच-32 में 50 ऐसे बच्चे इलाज के लिए आते हैं।