अस्पताल में टीबी के एक मरीज की जिंदगी नरक से भी बदतर हो गई है। एक तो उसे आंखों से नजर नहीं आता, दूसरा उसे भर्ती नहीं किया गया और न ही इलाज दिया गया। अब वह अस्पताल में ही फर्श पर सोता है। लोगों से मांग-मांगकर रोटी खाता है। मां मर गई, तो पिता ने दूसरी शादी कर ली। मामला हरियाणा के अंबाला कैंट का है।
सरकार टीबी को लेकर लोगों को कितना भी जागरूक करे, लेकिन समाज में फैले भेदभाव के कारण बीमारी का पता चलते ही एक ब्लाइंड की जिंदगी नरक जैसी हो गई है। अंध महाविद्यालय से वापस भेजे जाने और टीबी अस्पताल द्वारा भर्ती नहीं किए जाने के कारण उसने सिविल अस्पताल को ही अपना ठिकाना बना लिया है। फर्श पर सोकर रात गुजारता है और दूसरों से रोटी मांगकर या रोटी बैंक की तरफ से खाना मिलने पर अपनी भूख मिटा रहा है।
विडंबना यह है कि स्वास्थ्य मंत्री के क्षेत्र में ऐसा हो रहा है, पर अधिकारी नियमों का हवाला देकर मानवता को शर्मसार कर रहे हैं। बता दें कि आंखों से 75 प्रतिशत ब्लाइंड कर्ण कुमार निवासी वार्ड नंबर-2, राजीव कॉलोनी, घरौंडा (करनाल) की माता का कुछ साल पहले निधन हो गया था। पिता दीपक कुमार ने दूसरी शादी कर ली। इसके बाद सौतेली मां ने घर से बाहर निकाल दिया।
पानीपत के अंध विद्यालय से दसवीं पास की। इसके बाद वह अंबाला आ गया और अंध महाविद्यालय के अध्यापकों से संपर्क किया, लेकिन टीबी की बीमारी का पता चलने पर उन्होंने रखने से मना कर दिया।