श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पावन स्वरूपों के लापता मामले में पहली बार पंथक कटघरे में खड़ी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की कार्यकारिणी द्वारा बदले गए अपने ही फैसलों के दूरगामी परिणाम निकलेंगे। 27 अगस्त की कार्यकारिणी में मामले के आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई करने का दावा करने वाली कार्यकारिणी ने अपने फैसले किस दबाव में पलटे, पंथक हलकों में इस पर चर्चा तेज हो गई है।
सूत्रों के अनुसार, एसजीपीसी को इस बात का भय था कि पुलिस के सामने मामले में बर्खास्त और निलंबित किए गए अधिकारी-कर्मचारी लापता स्वरूपों का सच उगल देते। इससे एसजीपीसी का संचालन करने वाले राजनीतिक परिवार के लिए कई पंथक चुनौतियां पैदा हो जाती। एसजीपीसी कार्यकारिणी लापता स्वरूपों के साथ जुड़े दस्तावेजों को पुलिस और कानून के सामने रखने से भयजदा थी।
कार्यकारिणी को इस बात की अनुभूति हो चुकी थी कि यदि इन कर्मचारियों के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करवाया गया, तो पुलिस जांच में लापता स्वरूपों के दस्तावेज भी कानून के कटघरे में रखे जाते। यह भी चर्चा है कि इन कर्मचारियों में कुछ ने स्पष्ट कर दिया था कि आपराधिक मामला दर्ज करवाने के बाद वह पुलिस के सामने इस मामले का सच उगलने में देर नहीं करेंगे।
यही बात एसजीपीसी अध्यक्ष गोबिंद सिंह लौंगोवाल के कार्यकारिणी की बैठक में अपने फैसले वापस लेने का कारण बनी। हालांकि एसजीपीसी कार्यकारिणी के इस फैसले का बादल परिवार विरोधी पंथक संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। अपनी स्थापना के 100वें वर्ष में दाखिल एसजीपीसी पहली बार ऐसे मामले में फंसी है। बदले गए फैसले से एसजीपीसी की साख तो कमजोर हुई ही है, अगले साल होने वाले चुनाव में भी इस मुद्दे पर अकाली दल को संगत के सवालों का जवाब देना कठिन हो जाएगा।