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लापता पावन स्वरूपः ‘पुलिस जांच’ के खौफ ने बदलवा दिया एसजीपीसी कार्यकारिणी का फैसला

Mon, 07 Sep 2020 10:10 AM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमृतसर

सार

  • बर्खास्त व निलंबित कर्मियों के पुलिस जांच में सच उगल देने का था डर
  • दूरगामी होंगे कार्यकारिणी द्वारा बदले गए फैसलों के प्रभाव
  • शिअद को आगामी एसजीपीसी चुनाव में देना होगा जवाब
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गोबिंद सिंह लोंगोवाल - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पावन स्वरूपों के लापता मामले में पहली बार पंथक कटघरे में खड़ी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की कार्यकारिणी द्वारा बदले गए अपने ही फैसलों के दूरगामी परिणाम निकलेंगे। 27 अगस्त की कार्यकारिणी में मामले के आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई करने का दावा करने वाली कार्यकारिणी ने अपने फैसले किस दबाव में पलटे, पंथक हलकों में इस पर चर्चा तेज हो गई है।
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सूत्रों के अनुसार, एसजीपीसी को इस बात का भय था कि पुलिस के सामने मामले में बर्खास्त और निलंबित किए गए अधिकारी-कर्मचारी लापता स्वरूपों का सच उगल देते। इससे एसजीपीसी का संचालन करने वाले राजनीतिक परिवार के लिए कई पंथक चुनौतियां पैदा हो जाती। एसजीपीसी कार्यकारिणी लापता स्वरूपों के साथ जुड़े दस्तावेजों को पुलिस और कानून के सामने रखने से भयजदा थी।

कार्यकारिणी को इस बात की अनुभूति हो चुकी थी कि यदि इन कर्मचारियों के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करवाया गया, तो पुलिस जांच में लापता स्वरूपों के दस्तावेज भी कानून के कटघरे में रखे जाते। यह भी चर्चा है कि इन कर्मचारियों में कुछ ने स्पष्ट कर दिया था कि आपराधिक मामला दर्ज करवाने के बाद वह पुलिस के सामने इस मामले का सच उगलने में देर नहीं करेंगे।
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यही बात एसजीपीसी अध्यक्ष गोबिंद सिंह लौंगोवाल के कार्यकारिणी की बैठक में अपने फैसले वापस लेने का कारण बनी। हालांकि एसजीपीसी कार्यकारिणी के इस फैसले का बादल परिवार विरोधी पंथक संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। अपनी स्थापना के 100वें वर्ष में दाखिल एसजीपीसी पहली बार ऐसे मामले में फंसी है। बदले गए फैसले से एसजीपीसी की साख तो कमजोर हुई ही है, अगले साल होने वाले चुनाव में भी इस मुद्दे पर अकाली दल को संगत के सवालों का जवाब देना कठिन हो जाएगा।
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खुल सकती थी सिफारिशी पत्रों की पोल

वहीं यदि इन अधिकारियों और कर्मचारियों को कानून के कटघरे में खड़ा किया जाता तो पंजाब सरकार का इस मामले में सीधा दखल हो जाता। पुलिस विभाग दस्तावेजों की जांच के लिए एसजीपीसी के दफ्तरों के रिकॉर्ड को खंगालता। एसजीपीसी के प्रबंधन में एक विशेषता यह भी है कि जब भी अध्यक्ष या मुख्य सचिव के नाम का सिफारिश का पत्र आता है, वह अपने दफ्तर नोट में सिफारिश करने वाले का नाम भी लिख देते हैं।

अब लौंगोवाल ने यह दावा किया है कि पावन स्वरूप कहीं नहीं गए और न ही उनकी बेअदबी हुई है। हालांकि इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ पावन स्वरूपों को मंगवाने की सिफारिश राजनीतिक आकाओं द्वारा की गई है। पुलिस जांच में रिकॉर्ड खंगालने के दौरान सिफारिशों के पत्रों में अकाली लीडरशिप के नाम उजागर होने का डर था।  

तत्कालीन कार्यकारिणी सदस्यों की सदस्यता रद्द करें जत्थेदार
ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट फेडरेशन के अध्यक्ष मंजीत सिंह भोमा ने कहा कि जिस प्रकार डेरा साध को माफी देने के लिए तत्कालीन जत्थेदार अकाल तख्त साहिब को चंडीगढ़ स्थित सरकारी कोठी में बुलाया गया था, उसी प्रकार पावन स्वरूपों के संवेदनशील मामले में एसजीपीसी की तत्कालीन कार्यकारिणी को बचाने के लिए साजिश रची गई है। एसजीपीसी अध्यक्ष ने शिअद (बादल) के सुप्रीमो के आदेश पर संगत की आंखों में धूल झोंक कर इस मामले को रफादफा करने का नाकाम प्रयास किया है।

फेडरेशन तत्कालीन कार्यकारिणी को दी गई माफी को रद्द करती है। कोई भी सिख उनके विरुद्ध 295 (ए) के अंतर्गत मामला दर्ज करवा सकता है। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह एसजीपीसी के तत्कालीन कार्यकारिणी सदस्यों को तलब कर उनकी सदस्यता को खत्म करे। इन पर उम्र भर कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। न ही यह भविष्य में गुरु घरों के प्रबंध की कोई जिम्मेदारी निभा सके। फेडरेशन इस मामले में अपना संघर्ष जारी रखेगी।
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