अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के प्रति पाठकों का प्यार जारी है। रोजाना अलग-अलग मुद्दों पर लिखी गईं पाठकों की कविताएं ई-मेल के जरिए प्राप्त हो रही हैं। रचनाएं लिखने वालों में विद्यार्थियों के साथ गृहिणी, नौकरीपेशा, युवा, सीनियर सिटीजन आदि हैं। अब कई पाठक हैं, जो शब्द सीमा के दायरे में आकर अपने कविताएं व रचनाएं लिख रहे हैं। रचनाओं के प्रकाशन में अब कुछ ही दिन बचे हैं। अमर उजाला की पूरी कोशिश रहेगी कि जिन लोगों ने मानकों के मुताबिक रचनाएं भेजी हैं, उन्हें जरूर प्रकाशित किया जाए।
पितृ श्राद्ध
पितरों के प्रति श्राद्ध मात्र सांस्कृतिक परंपरा-सम्मान नहीं, एक विज्ञान है
जिन पूर्वजों के गुण-कौशल, डीएनए विरासत में मिले और हमारा व्यक्तित्व है
उनके प्रति श्राद्ध पर श्रद्धा, कृतज्ञता, आस्था-संज्ञान पितृऋण के प्रति दायित्व है
मातृ-पितृ ऋण से मनुष्य आध्यात्मिक दैविक-भौतिक उन्नति कर सकता है
उनकी पुण्य स्मृति से, उनके प्रतिपादित संस्कार को विरासत में रोपने का पर्व है श्राद्ध कर्म
कौआ, कुत्ता-गाय, सृष्टि के जीव परायों को अन्न का तर्पण, वसुधैव कुटुम्बकम का दर्पण है
परोक्ष रूप में विभिन्न योनियों-पूर्वजों के प्रति एक वैज्ञानिक-सात्विक त्यागमयी समर्पण है
जब हाथ आसमां तक नहीं पहुंचते, इस श्राद्ध की क्रिया से मैं बुजुर्गों के पैर छू लेती हूं..
- उमा समाजसेवी पंचकूला
ये वक्त चल रहा है...
ये वक्त चल रहा है, वक्त का ये कालचक्र ही है मेरे भाई
ये कालचक्र ही है जो अपनों को-अपने हिस्से की मौत याद आई
कभी मद में मदमस्त हो घूमते थे, गली नुक्कड़ बाजारों में
सहमे-सहमे छिपे-छिपे से, कैद हैं, घर की चार दीवारों में
मौत नंगी नाच नाचती, दस्तक ना दे-दे, जल-वायु और भूमि मैं
ये सोच के पश्चाताप भी न करता, हूं हत्यारा और खूनी मैं
तू थलचर है नर नारायण का, क्यों नभचर-जलचर खाता है
तू नरभक्षी हत्यारा पापी, अब क्यों मरण से कतराता है!
अभी तो हम जिंदा है और जिएंगे, जीने का अरमान बहुत है
अभी ढूंढ रहा मैं भी उनको, जो कहते थे, अपना तो नाम बहुत है
ये वक्त है मुक्ति का पापों से, कर कुछ कर्म-धर्म, पास जो तेरे माया है!
- मुकेश सुथार, चंडीगढ़
युवा मांगे जवाब
भर्ती निकले तो इम्तिहान नहीं
परीक्षा हो तो परिणाम नहीं
परिणाम निकले तो ज्वाइनिंग का नाम नहीं
आखिर क्यों युवाओं का सम्मान नहीं
बस करो मजाक अब, युवा मांगे हिसाब अब
बात करो, संवाद करो
दो हमारे प्रश्नों का जवाब अब
क्यों हर भर्ती पंचवर्षीय योजना है
कैसी ये परीक्षा प्रणाली है
आपने युवाओं की छीन ली जवानी है
- मनीष कुमार, हल्लोमाजरा
सोशल मीडिया
सोशल मीडिया का जैसे ही हुआ हमारे जीवन में वेलकम
तब से मोबाइल लाइफ शुरू, सोशल लाइफ खत्म
ट्विटर, व्हाट्सएप, फेसबुक पर पूछा जाए सवाल
बंदा इमोजी डाल बता देता कितना है बेहाल
टेढ़े-मेढ़े मुंह बना सेल्फी ले लड़कियां करें पोस्ट
फिर मुंह फुलाए जब लाइक कमेंट न आए मोस्ट
क्या खाया क्या खाएंगे इसका भी करते प्रचार
भला हो क्या निकाला इसका तो ना दिया समाचार
- श्रेयांश तिवारी, चंडीगढ़
कपड़े हो गए छोटे, लाज कहां से आए
कपड़े हो गए छोटे, लाज कहां से आए
रोटी हो गई ब्रेड, ताकत कहां से आए
फल हो गए प्लास्टिक के, खुशबू कहां से लाए
चेहरा हो गया मेकअप का, रूप कहां से आए
शिक्षक हो गए ट्यूशन के, विद्या कहां से आए
भोजन हो गए होटल के, तंदरुस्ती कहां से आए
प्रोग्राम हो गए केबल के, संस्कार कहां से लाए
आदमी हो गए पैसे के, दया कहां से आए
धंधे हो गए हाईफाई, बरकत कहां से आए
भक्ति करने वाले स्वार्थी हो गए, भगवान कहां से आए
जिंदगी हो गई भागो भागो की, जीवन में सुख शांति कहां से लाए
- नेहा गुप्ता, फैशन डिजाइनर, पंचकूला
मुझे रोजगार चाहिए
खाली कंधों पर थोड़ा सा भार चाहिए
बेरोजगार हूं साहिब, मुझे रोजगार चाहिए
जेब मैं पैसे नहीं हैं, डिग्री लिए फिरता हूं
दिनोंदिन अपनी नजरों मैं गिरता हूं
कामयाबी के घर मैं खुले मिजाज चाहिए
बेरोजगार हूं साहिब, मुझे रोजगार चाहिए
दिन रात करके मेहनत करता हूं
सूखी रोटी खाकर चैन से पेट भरता हूं
नौकरी पाने के लिए यहां जुगाड़ चाहिए
बेरोजगार हूं साहिब, मुझे रोजगार चाहिए
- अरविंद कुमार, मलोया, चंडीगढ़