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हिंदी हैं हमः इंसानों की भीड़ तो है, पर इंसानियत गुम है...भावनाएं बयां करती दिलचस्प रचनाएं पढ़ें

Wed, 09 Sep 2020 12:59 PM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, चंडीगढ़
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हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
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हिंदी भाषा के प्रति पाठकों का प्रेम बढ़ता जा रहा है। अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान से रोजाना बड़ी संख्या में पाठक जुड़ रहे हैं। हिंदी में अपनी अपनी रचनाएं लिखकर पाठक हमें ई-मेल कर रहे हैं। जिन पाठकों ने अपनी रचनाएं अब भी नहीं भेजी हैं, वह जल्द से जल्द से भेज दें। 13 सितंबर के बाद रचनाओं का प्रकाशन नहीं किया जाएगा।
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यदि आपने रचनाएं भेजी हैं और वह अब तक प्रकाशित नहीं हुई हैं तो उन्हें एक बार देखें। संभव है कि आपकी रचनाएं 100 शब्दों से ज्यादा हों या मेल में फोटो अटैच न की हो। यह भी हो सकता है कि आपने जो फोटो भेजी होगी, वह छपने लायक न हो। ऐसी स्थिति में उसमें सुधाकर आप दोबारा से मेल कर सकते हैं।

गुरु,  शिक्षक,  टीचर  या  कहो  अध्यापक
ज्ञान का स्रोत,  प्रचार  व  प्रसार के  वाहक
शिक्षा का स्तंभ, भविष्य निर्माण के सहायक
विद्यार्थियों को बनाते रोजगार के लायक
राष्ट्र की धरोहर, विकास के परिचायक
सभी करते सम्मान, बड़े हो या बालक
- सुनील अरोड़ा, चंडीगढ़

नि:शब्द हो जाता है, फिर वो प्रेम...

नि:शब्द हो जाता है, फिर वो प्रेम
जो रूह से, रूह में मिलकर
एकसार हो जाता है ...
आत्मिक सूक्ष्मता के मुहाने पर
इक अद्भुत मिलन
बस यूं हो जाता है प्रेम परिभाषित...
पाप बोध से परे, फिर वो दिव्य मिलन
जो चेतन से होकर अवचेतन काया से
लिपट जाता है ...और बस यहीं
मिलन मोक्ष कहलाता है .....
- डेजी बेदी जुनेजा, कवयित्री, मोहाली

यहां लिहाज की परख लिबास करता है

यहां लिहाज की परख लिबास करता है
झूठ बेखौफ हंसता और सच डरता है
इंसान पत्थर और पत्थर भगवान है
ख्वाब दिलों में कैद और खौफ आजाद है
यहां रूह फिजूल और रंग मशहूर है
इंसानों की भीड़ है, पर इंसानियत गुम है
यहां रहने वाला हर कोई चार लोगों से परेशान है
साहिब, ये इंसानी बस्ती वाकई बहुत महान है
- प्रज्ञा सोनी, पिंजौर

न कोई अंत न आरंभ, शून्य से उपजे प्रारंभ

न कोई अंत न आरंभ, शून्य से उपजे प्रारंभ
शून्य से ही लिया आकार, जन्मा यह अनंत ब्रह्मांड
जीव-जंतुओं  की हुई उत्पत्ति, प्राणियों ने धरे प्राण
एकत्रित हो अनंत अणुओं ने, मां धरती को दिया आकार
अनेक सिद्धि, अद्भुत सिद्धांत, अनगिनत नियमों से एक निर्माण
काल-समय, अनंत आयाम, अनेक रूप, एक ब्रह्मांड
स्वर्ग से ऊंचा इसका स्थान, उत्तम यह समस्त संसार
मानो यह सिद्धांत अटूट, शून्य है ब्रह्मांड का वास्तविक स्वरूप
- पार्थ दत्ता, विद्यार्थी चंडीगढ़

यहां सब कुछ बिकता है...

यहां सब कुछ बिकता है, दोस्तों रहना जरा संभल के
बेचने वाले हवा भी बेच देते हैं, गुब्बारों में डाल के
सच बिकता है, झूठ बिकता है, बिकती हर कहानी
तीन लोक में फैला है, फिर भी बिकता है बोतल में पानी
कभी फूलों की तरह मत जीना, जिस दिन खिलोगे टूट कर बिखर जाओगे
जीना है तो पत्थर की तरह जियो, जिस दिन तराशे गए उस दिन खुदा बन जाओगे
- ब्रह्मानंद मेहरा, सेक्टर-14 पंचकूला
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माना कि यह घड़ी सख्त सी है...

माना कि यह घड़ी सख्त सी है, माना कि वक्त रूठा सा है
माना कि अंधेरा घना सा है, वक्त बदलेगा अगर
इन अंधेरों से लड़े वह उजाला अगर तुझमे है,
सदमे से उबरे वह हौसले का गुब्बारा अगर तुझमे है
इस वक्त को बदलने का दम अगर तुझमे है
इस डूबती किश्ती को तू पार लगाएगा
अगर वह चाह तुझमे है
बस हिम्मत मत खोना अंधेरों में
वक्त बदलेगा जरूर तेरा
अगर वह उम्मीद की लो तुझमे है
मानेगी दुनिया कल को लोहा तेरा,
अगर खुद को जला कर अपने भविष्य को उजाला करने का दम तुझमे है
- अनुराग शर्मा, चार्टर्ड अकाउंटेंट चंडीगढ़
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