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हिंदी हैं हमः फौजी भाइयों को नमन, आपका बलिदान कोई भूल नहीं पाता है...पढ़ें दिलचस्प रचनाएं

Fri, 11 Sep 2020 11:10 AM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, चंडीगढ़
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Hindi Hai Hum - फोटो : अमर उजाला
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अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान को पाठक लगातार अपना प्यार और समर्थन प्रदान कर रहे हैं। पाठकों की ओर से हमें रोजाना ई-मेल के जरिए रचनाएं प्राप्त हो रही हैं। लगभग सभी पाठक अपनी स्वरचित रचनाएं हमें भेज रहे हैं। इससे यह भी पता लगता है कि ट्राइसिटी में हिंदी को चाहने वाले बड़ी संख्या में हैं। पाठकों की रचनाएं 14 सितंबर तक प्रकाशित की जाएंगी। आप लोग अपनी रचनाएं 13 सितंबर तक भेज दें। उसके बाद कोई रचना स्वीकार नहीं की जाएगी।
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हिंदी भाषा
हिंदी भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा बोली व समझी जाने वाली भाषा है क्योंकि यह हमारी मातृभाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। यह जन-जन की भाषा है। न केवल हमारे देश में बल्कि विदेश में भी हिंदी भाषा की काफी लोकप्रियता है। यह रोजगार परक एवं वैज्ञानिक भाषा है क्योंकि इसमें जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है। पूरे भारत को एकता के सूत्र में बांधने का सामर्थ्य इसी भाषा में है। हमें स्वयं व अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा हिंदी से प्रेम करना सिखाना चाहिए। मुझे अपनी मातृभाषा पर गर्व है।
- सोहनलाल, प्राध्यापक हिंदी, कैंबवाला

फौजी... इस देश का वह है सम्मान

इस देश का वह है सम्मान, इस देश का वह रखवाला है
देखकर उसका शौर्य और पराक्रम, दुश्मन का दिल दहलाता है
बारिश, कड़क धूप हो या सर्द हवाएं, देश की खातिर सब कुछ फौजी सह जाता है
जख्म जिस्म में लेकर देश के लिए लड़ता, मन फौजी का कभी ना घबराता है
आता है जब देश पर संकट, अपनी जान देश पर लुटाता है
फौजी भाइयों को शत शत नमन, आपका बलिदान न कोई भूल पाता है
फौजी की वीरगाथा है ऐसी, मरकर भी वो अमर हो जाता है।
- प्रिया नेगी, गृहिणि सेक्टर 46 चंडीगढ़

देश से बढ़ कर कुछ नहीं होता

देश सेवा का मौका सबको है मिलता
वो देश के सैनिक हैं जो देश की रक्षा करते हैं
हम भी देश के सैनिक हैं जो देश प्रेम करते हैं
आओ मिलकर देश की सेवा करें आम नागरिक बन के ही सही
देश पे मर मिट जाने की कसम खाएं, आम नागरिक बन के ही सही
तभी वो दिन आएगा जब चारों ओर खुशहाली का माहौल होगा
भारत देश सब से न्यारा पूरे जग में बस एक यही नारा होगा
देश से बढ़ के कुछ नहीं होता
- अश्विनी ठाकुर, बिजनेसमैन सेक्टर-50 सी, चंडीगढ़

कई बार हम इस कदर हो जाते हैं

कई बार हम इस कदर हो जाते हैं
सीरत छोड़, सूरत से दिल लगाते हैं
हो उजाला लाख मगर, हम अंधेरों की ओर चले जाते हैं
हो पता सच का मगर, हम झूठ का साथ निभाते हैं
खुशी बुलाए हमें खुद ही, हम दर्द से हाथ मिलाते हैं
फूलों भरी राह छोड़कर, कांच पर चलने जाते हैं
भीड़ भरी दुनिया छोड़कर, अकेलेपन को अपनाते हैं
अपनों की बातें न सुनकर, हम परायों में विश्वास जताते हैं
प्यार भरा दिल छोड़कर, नफरत की दीवार बनाते हैं
फिर उसी दीवार में बंद हो, उसे छोड़ उसकी यादों में खो जाते हैं
- शालू शर्मा, गांव खंगेसरा, पंचकूला

समाज बढ़ चले...

घर, गली, अगल-बगल, दुआर और ओसारा भी
साफ हो महल, नगर, डगर, समाज बढ़ चले
नहर, नदी, पोखर, तालाब जोड़ और सरोवर भी,
साफ हो सगर, गगर कहीं दिखे न जलजले
ईश  देव   जगदीश   परमात्मा  के  धाम,
साफ  हो  कि दीन, हीन अनवरत बढ़े चले
आसमान,  व्योम,  अंतरिक्ष,  अभ्र,  विष्णुपाद
साफ हो गगन मनु अनंत सीढ़ियां चले
- विनय कुमार ओझा, इंजीनियर, पंचकूला

ऐ चीन सुन ले हमारी ललकार...

ऐ चीन सुन ले हमारी ललकार...
हम शांति प्रिय हैं, लड़ते नहीं, लेकिन जब बात आए सम्मान पर
तो हम भी पीछे हटते नहीं, सीमा पर सैनिक डटे हुए
तो हम भी पीछे खड़े हुए, वो तुम को मुंहतोड़ जवाब दे रहे
तो हम भी तेरी अर्थव्यवस्था बिगाड़ रहे, हर दिल में ज्वाला जलती है
जब देश की आन पे पड़ती है, हर पुरुष यहां का वीर सपूत
तो हर नारी रणचंडी है, ऐ चीन सुन ले हमारी ललकार
अब ना तू हमसे यूं टकरा, जब संकट आए इस देश पर
हिंदुस्तान एक जुट खड़ा हुआ है
- रेनु नागर, शिक्षिका, सेक्टर-51 चंडीगढ़
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पिता... घर को जो चलाते हैं

घर को जो चलाते हैं, वो पिता ही होते हैं
मेहनत जो हर पल करते कमाकर वही लाते हैं
हमारी हर मांग जो पूरी करते हैं वो ही पिता कहलाते हैं
किसी-किसी गलती पर हमारी थोड़ा सा झुंझला जाते हैं
किसी किसी बात पर हमारी बहुत मुस्करा जाते हैं
लाड़-प्यार बच्चों पर ये भी कम नहीं लुटाते हैं
कभी-कभी ये भी मां के जैसे काम कर जाते हैं
ये भी अपने बच्चों के साथ कभी-कभी बच्चे बन जाते हैं
वो कैरम के खेल इनके साथ ही तो खेले जाते हैं
घर को जो पूरा करते वो पिता ही तो होते हैं
- तृप्ती, विद्यार्थी, रायपुररानी पंचकूला
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