भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लाहौर जेल में रहे एक स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन बंद करने का आदेश पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है।
जस्टिस राजेश बिंदल की एकल बेंच ने फैसले में कहा है कि जब देश स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान दे रहा है, तो अफसरों की ओर से अड़चन पैदा करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
97 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी मोहन सिंह ने एडवोकेट जीपीएस बल्ल के माध्यम से याचिका दायर कर कहा था कि 31 दिसंबर 2007 को केंद्र सरकार ने उनकी पेंशन यह कहते हुए बंद कर दी कि वह जेल में सजा काटना साबित नहीं कर पाए। कहा था कि उनकी ओर से साल 1994 में दायर याचिका में केंद्र सरकार मान चुकी थी कि उनके लाहौर जेल में रहने की पुष्टि पंजाब सरकार ने की है। यह याचिका साल 1995 में मंजूर कर ली गई थी। हालांकि बाद में केंद्र सरकार ने साल 2007 में पेंशन बंद कर दी।
स्वतंत्रता सेनानियों को यह पेंशन केंद्र सरकार की ओर से संचालित स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन योजना के तहत दी जा रही है। याचिका में बताया गया कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मोहन सिंह 20 अक्तूबर 1942 से लेकर 24 जुलाई 1943 तक लाहौर जेल में सजा काटते रहे। केंद्र सरकार ने योजना बनाई थी कि आंदोलन के दौरान छह महीने या इससे अधिक की सजा काटने वालों को सम्मान पेंशन दी जाएगी।
इसी के तहत मोहन सिंह ने पेंशन की मांग की थी, पर केंद्र सरकार ने याचिका के जवाब में कहा कि वह जेल में रहने की बात साबित नहीं कर पाए। दूसरी ओर मोहन सिंह के वकील ने कहा कि जब केंद्र सरकार पहले एक याचिका में कह चुकी है कि पंजाब सरकार ने मोहन सिंह के जेल में रहने की पुष्टि कर दी तो वह पेंशन के हकदार हैं। इसी पर बेंच ने अपने फैसले में कड़ी टिप्पणी की है।
कहा है कि जब देश स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान दे रहा है, तो अफसरों की ओर से इस मामले में अड़चन की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों को अन्य आपराधिक मामलों की भांति नहीं लिया जाना चाहिए। पात्र को योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।