इस्तीफे के आधार पर निरक्षर महिला को सेवा से बाहर करने के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कंपनी को झटका देते हुए पीड़िता को मुआवजे के तौर पर 3 लाख रुपये का भुगतान करने या सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने इस्तीफे को लेकर अपने फैसले में कई सवाल उठाए और कहा कि इस मामले में पीड़िता को कागज पर क्या लिखा है इसकी जानकारी न होने से इन्कार नहीं किया जा सकता। मेसर्स क्रिएटिव एज मेन्स वियर प्राइवेट लिमिटेड प्रबंधन हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते पानीपत लेबर कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसके तहत महिला श्रमिक को बहाल करने और 50 प्रतिशत पिछला वेतन जारी करने का आदेश दिया गया था। याचिका में प्रबंधन ने तर्क दिया कि महिला ने खुद इस्तीफा देकर नौकरी छोड़ी थी।
महिला ने दलील दी थी कि उसे 30 जुलाई 2007 को 4,100 रुपये के मासिक वेतन के साथ एक ऑपरेटर के रूप में नियुक्त किया गया था। एक अगस्त 2009 को उसे बताया गया कि उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। सभी पक्षों को सुनने के बाद और रिकॉर्ड देखने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि महिला की सेवाएं 30 जुलाई से समाप्त करते हुए प्रबंधन ने दर्शाया था कि उसने अपनी इच्छा से इस्तीफा दिया है और उसे उसी दिन स्वीकार कर लिया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस्तीफा हिंदी में निपुण व्यक्ति द्वारा लिखा गया प्रतीत होता है। महिला कर्मचारी ने इस पर अपने अंगूठे का निशान लगाया है, जो दर्शाता है कि वह निरक्षर है। हाईकोर्ट ने पाया कि प्रबंधन का आचरण विश्वसनीयता में कमी वाला है क्योंकि त्यागपत्र और स्वीकृति की प्रामाणिकता का समर्थन करने के लिए कोई गवाह पेश नहीं किया गया।
निरक्षरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि यह असंभव था कि महिला दस्तावेजों की सामग्री को समझती थी। हाईकोर्ट ने सेवा समाप्त करने के फैसले को अवैध करार देने वाले लेबर कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा। हालांकि कंपनी ने कहा कि वह महिला को बहाल नहीं कर सकती क्योंकि कंपनी बंद हो चुकी है। ऐसे में हाईकोर्ट ने प्रबंधन को विकल्प दिया कि या तो महिला कर्मचारी को बहाल करें या एकमुश्त 3,00,000 रुपये मुआवजे का तीन माह में भुगतान करें।