जस्टिस रावल ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि कुछ भी बोल दिया जाए। राजनेता अक्सर भावनाओं में बह कर इस तरह की टिपण्णियां कर देते हैं। सुखबीर बादल और मजीठिया की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अशोक अग्रवाल और आरएस चीमा ने इस याचिका की मान्यता पर सवाल उठाए।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि वह मामले को लेकर अगली सुनवाई पर सभी पक्षों की दलीलें सुनेंगे। लिहाजा हाईकोर्ट ने सुखबीर बादल और बिक्रमजीत सिंह मजीठिया दोनों को एक-एक लाख के निजी बॉन्ड भर जमानत देते हुए उन्हें मामले की अगली सुनवाई पर पेश होने के आदेश दे दिए हैं।
क्या है मामला
जस्टिस रंजीत सिंह ने हाईकोर्ट को शिकायत देते हुए सुखबीर बादल और बिक्रमजीत सिंह मजीठिया पर आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों ने उन पर और उनकी लॉ की डिग्री पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की है।
इसके अलावा आयोग और उनके खिलाफ विभिन्न समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर दिए गए इंटरव्यू का भी हवाला दिया था। जस्टिस रंजीत सिंह ने कहा था कि यह सीधे तौर पर कमीशंस ऑफ इन्क्वाइरी एक्ट की धारा-10 ए का उल्लंघन है।