बुड़ैल जेल केस में जिला अदालत के फैसले के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चंडीगढ़ प्रशासन की अपील पर सुनवाई स्थगित हो गई है। संबंधित जज के छुट्टी पर होने के कारण सुनवाई नहीं हो सकी है। अब सुनवाई 29 मार्च को होगी।
पिछली सुनवाई पर एकल बेंच ने ट्रायल कोर्ट का रिकार्ड तलब किया था। चंडीगढ़ प्रशासन ने अपील में कहा था कि सुबूतों के अभाव और ट्रायल में ढिलाई के कारण ही 14 आरोपियों को बरी किया गया। यह मामला बहुत गंभीर है और आरोपियों को बरी करने का फैसला गलत है।
हाईकोर्ट से मांग की गई थी कि जिला अदालत का फैसला पलटते हुए आरोपियों को सजा दी जानी चाहिए। पिछले वर्ष 11 साल पुराने जेल ब्रेक केस में चंडीगढ़ के सीजेएम अनुभव शर्मा की अदालत ने बब्बर खालसा इंटरनेशनल के सदस्य आतंकी जगतार सिंह हवारा और परमजीत सिंह भ्यौरा को दोषी मानते हुए उनकी सजा अंडरगोन की थी, यानी मामले में जितनी सजा बनती थी, वह जेल में काट चुके हैं।
इस मामले में जेल में और रहने की जरूरत नहीं है। सीजेएम कोर्ट ने दो को दोषी ठहराते हुए 14 अन्य आरोपियों को सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।
मामले में पुलिस ने 21 व्यक्तियों को आरोपी बनाते हुए दोष पत्र दाखिल किया था। इनमें से जेल के तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट डीएस राणा, डिप्टी जेल सुपरिंटेंडेंट दलबीर सिंह संधू, सहायक जेल सुपरिंटेंडेंट वीएम गिल और पीएस राणा, वार्डर इंद्र सिंह, हवलदार निशान सिंह सहित नारायण सिंह चौरा, नंद सिंह, शेर सिंह, लखविंदर सिंह, गुरदीप सिंह, सुबेग सिंह, गुरनाम सिंह और एसपी सिंह को बरी कर दिया गया था।
इनके अलावा पाक जासूस आबिद मोहम्मद पहले ही सजा पूरी कर चुका था। जगतार सिंह तारा, गुरविंदर सिंह गोल्डी और देवी सिंह को भगोड़ा करार दिया था। तारा के पकड़े जाने के बाद उसके खिलाफ अलग से ट्रायल चल रहा है। एक महिला आरोपी बलजीत कौर की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी थी। बरी किए व्यक्तियों को दोषी करार देने की मांग करते हुए अपील दाखिल की गई थी।
आपराधिक साजिश साबित नहीं कर पाई थी पुलिस
सीजेएम ने 123 पन्नों के अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष केस में पूरी तरह से आपराधिक साजिश को साबित करने में नाकाम रहा है। खासकर जेल ब्रेक में जेल अधिकारियों का ही रोल साबित नहीं हो सका। उनके खिलाफ अभियोजन पक्ष अपराध साबित ही नहीं कर सका। वहीं, जगतार सिंह हवारा और परमजीत सिंह भ्यौरा के मामले में कोई ठोस बहस नहीं हुई। हालांकि, केस में उनकी दोबारा गिरफ्तारी उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 224 के तहत अपराध साबित करने में पर्याप्त थी।