हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज के आदेश के बाद गृह विभाग ने डीजीपी पद के लिए सात नामों का पैनल बनाकर तैयार कर दिया है। विज के आदेश के 24 घंटे में ही गृह विभाग हरकत में आया है। जिन अधिकारियों के नाम पैनल में रखे गए हैं, उनमें तीन डीजी रैंक और चार एडीजी रैंक के अफसर नियम-शर्तों में शामिल हो रहे हैं। डीजीपी के लिए 30 वर्ष की सर्विस अनिवार्य की गई है तथा छह महीने से ज्यादा का सेवा कार्यकाल बचा होना आवश्यक है।
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इस लिहाज से 1984 बैच के एसएस देसवाल और 1986 बैच के केके सिंधु इस दौड़ से बाहर हो गए हैं, क्योंकि उनकी रिटायरमेंट इसी वर्ष 31 अगस्त को है। ऐसे में अब मुख्य तौर से पैनल में 1988 बैच के पीके अग्रवाल, 1989 बैच के मोहम्मद अकील और डा. आर.सी. मिश्रा के नामों पर ही विचार किया जा रहा है।
30 वर्ष की नौकरी पूरी कर चुके अफसरों में 1990 बैच के एडीजीपी शत्रुजीत कपूर, देशराज सिंह, आलोक राय व एसके जैन का नाम भी पैनल में शामिल हैं। लेकिन संघ लोक सेवा आयोग की ओर से शार्टलिस्ट करने के बाद सिर्फ तीन अफसरों का नाम ही सरकार को भेजा जाएगा, जिसमें पीके अग्रवाल, मोहम्मद अकील व डा. आरसी मिश्रा में से ही किसी को कमान दी जा सकती है।
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विज ने दांव चला, पर सीएम लेंगे फैसला
गृह मंत्री अनिल विज ने पैनल भेजने के लिए कह कर अपना दांव चल दिया है, लेकिन यह मुख्यमंत्री के ऊपर है कि वह डीजीपी मनोज यादव को हटाते हैं या नहीं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक डीजीपी का कार्यकाल न्यूनतम दो साल करने के लिए कहा गया है। ऐसे में मुख्यमंत्री मनोहर लाल विज की बात से कितना सहमत होंगे यह देखना होगा, क्योंकि अभी तक मुख्यमंत्री की तरफ से इस विषय में कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है। मालूम हो कि हुडडा सरकार में डीजीपी रंजीव दलाल छह साल तक डीजीपी के पद पर डटे रहे थे।
विज के पत्रों का जवाब नहीं देते डीजीपी
अनिल विज और डीजीपी मनोज यादव में तल्खी इस बात पर है कि वे विज के भेजे गए पत्रों पर जवाब नहीं देते थे। यह तल्खी उस समय और बढ़ गई थी जब विज ने अंबाला से आते समय अपनी गाड़ी अचानक पुलिस मुख्यालय की तरफ मोड़ दी थी और वहां निरीक्षण किया था। इस निरीक्षण में एक अधिकारी पर गाज भी गिरी थी, क्योंकि डायल 100 का प्रोजेक्ट उनकी ढिलाई के चलते लेट हो रहा था।
अधिकतम दो वर्ष कार्यकाल के बावजूद मनोज यादव रह सकते हैं डीजीपी
हरियाणा के डीजीपी मनोज यादव दो वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बावजूद पद पर बने रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट 3 जुलाई 2018 को राज्यों में डीजीपी के चयन, तैनाती के संबंध में सात निर्देश दे चुका है।
सातवें निर्देश में कहा गया है कि अगर राज्य या केंद्र सरकार ने अपने पुलिस कानून में ऐसा कोई प्रावधान या संशोधन किया है, जो सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार में दिए गए निर्देशों के विपरीत है (जिसमें प्रदेश डीजीपी का चयन और कार्यकाल भी शामिल है) तो ऐसी परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश ही लागू रहेंगे। राज्य व केंद्र के उन सभी पुलिस कानूनों के प्रासंगिक प्रावधानों पर स्टे रहेगा।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार का कानूनी मत है कि डीजीपी की नियुक्ति सीधे मुख्यमंत्री के अधीन आती है, बेशक गृह विभाग उनके पास हो अथवा नहीं। मौजूदा डीजीपी को इस कारणवश बदलना कि 18 जनवरी 2019 को उनके तैनाती आदेश में कार्यकाल पदभार संभालने से दो वर्ष तक ही दर्शाया गया था, न्यायोचित नहीं है।
हरियाणा पुलिस कानून,2007 की धारा 6 (2) में दिसंबर, 2018 में राज्य विधानसभा ने संशोधन किया गया था। ये 10 जनवरी 2019 से प्रभावी हुआ। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि डीजीपी का कार्यकाल एक वर्ष से कम नहीं होगा, जो एक और वर्ष तक विस्तार योग्य है। इस अनुसार डीजीपी की पद अवधि एक जमा एक अर्थात अधिकतम दो वर्ष तक ही हो सकती है। लेकिन वर्ष 2013 में एक रिट याचिका (हरीश साल्वे बनाम भारत सरकार एवं अन्य) सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसलिए धारा 6 (2 ) अनुसार डीजीपी मनोज यादव पर अधिकतम दो वर्ष कार्यकाल का प्रावधान लागू नहीं होता।