डॉ. आरके खटकड़।
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केंद्र सरकार के कृषि अध्यादेशों में कई खामियां हैं। अगर कृषि उपज, वाणिज्य व व्यापार अध्यादेश की बात करें तो इसके तहत किसान कहीं भी अपनी उपज बेचने को स्वतंत्र है। मगर देश के 80 प्रतिशत किसान छोटे व सीमांत वर्ग से हैं, जिनके पास कृषि विपणन योग्य उपज की मात्रा बहुत कम होती है और वह इस अध्यादेश के तहत दूर-दराज की मंडियों में अपनी उपज नहीं बेच सकते हैं।
इस तरह से कारपोरेट जगत व व्यापारी वर्ग ही इसका लाभ लेने में सक्षम हैं। इस अध्यादेश से मंडी एक्ट को कमजोर किया जा रहा है। इसके कमजोर होने से राज्य सरकार का मंडी से बाहर किसान की उपज की खरीद पर नियंत्रण खत्म हो जाएगा, जिससे कारपोरेट जगत व व्यापारी किसान की उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने को बाध्य नहीं रहेंगे और इससे नीचे के भाव पर खरीदारी के लिए स्वतंत्र कर दिए जाएंगे।
आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव हेतु कानून के तहत अनाज, दलहन, खाद्य तेल, आलू व प्याज को अनिवार्य सूची से हटाकर खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को मुक्त कर देगा। इस अध्यादेश के लागू होने से कारपोरेट जगत व व्यापारी वर्ग मनचाहे ढंग से भंडारण कर मुनाफाखोरी व कालाबाजारी करने को स्वतंत्र हो जाएंगे।
इससे आम उपभोक्ता महंगाई की मार में पिसता रहेगा। उधर, मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता व कृषि सेवा अध्यादेश के कारण बेलगाम अनुबंध खेती से किसान का शोषण करने के लिए कारपोरेट जगत व व्यापारी वर्ग स्वतंत्र हो जाएंगे।
- डॉ. आरके खटकड़, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, कृषि अर्थशास्त्र, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार।