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जाट आंदोलन इफेक्ट: ‘हैपनिंग’ बनाम ‘बर्निंग’ हरियाणा

Wed, 24 Feb 2016 01:04 PM IST
संजय अभिज्ञान/अमर उजाला, चंडीगढ़
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यह इत्तफाक बड़ा ट्रैजिक और नाटकीय था। पिछले शुक्रवार दोपहर साढ़े बारह बजे, चंडीगढ़ में, हरियाणा के उद्योग मंत्री कैप्टन अभिमन्यु जब अमर उजाला एमएसएमई कॉन्क्लेव में स्मॉल स्केल इंडस्ट्री के विकास का खाका रख रहे थे, ठीक उसी वक्त दंगाइयों की एक भीड़ रोहतक स्थित उनके घर में आग लगा रही थी और उनके परिवार के नौ लोगों की जान खतरे में थी।
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जिस प्रदेश में, खुद उद्योग मंत्री का घर सुरक्षित न हो, वहां करोड़ों के हमारे निवेश की हिफाजत की क्या गारंटी होगी? यह सवाल आज देश-विदेश के उन करीब पांच हजार निवेशकों के सामने खड़ा है, जिन्हें गुड़गांव में आगामी सात और आठ मार्च को होने वाले ′हैपनिंग हरियाणा ग्लोबल इनवेस्टमेंट समिट′ के निमंत्रण पत्र भेजे गए हैं।

खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के सामने भी, दंगों की आग बुझाने के बाद यदि कोई बड़ा सवाल है, तो यही है कि इस समिट की मार्फत हरियाणा में डेढ़ लाख करोड़ रुपये का निवेश लाने के उनके लक्ष्य का क्या होगा। निवेश का वायदा तो दूर, आज के हालात देखते हुए क्या निवेशक सम्मेलन में आने तक के बारे में सोच सकते हैं?
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पिछले नौ दिन की कहानी, दुःस्वप्न की जीत की कहानी

खुद को कृषि प्रधान प्रदेश की छवि से आजाद कराने को बेताब हरियाणा की पिछले नौ दिन की कहानी दरअसल एक महान स्वप्न पर एक दुःस्वप्न की जीत की कहानी है। अरसे बाद आयाराम-गयाराम की राजनीति से उबरकर वजूद में आई एक पक्की, बहुमत वाली राज्य सरकार इधर बार-बार सबको याद दिलाने की कोशिश कर रही थी कि हरियाणा सिर्फ दूध और बासमती पैदा नहीं करता।

हर मंच, हर प्लेटफार्म पर वित्त मंत्री बता रहे थे कि देश में बनने वाली हर दूसरी कार हरियाणा में बनती है, देश का हर तीसरा टू व्हीलर और हर दूसरी क्रेन भी हरियाणा के किसी प्लांट में तैयार होती है। पंजाब के प्रोग्रेसिव समिट और गुजरात के वायब्रेंट समिट के जवाब में हैपनिंग हरियाणा के मेगा शो का प्लान बनाने वाली यह सरकार गुड़गांव की आईटी, फरीदाबाद की लाइट इंजीनियरिंग, पानीपत के हैंडलूम, अंबाला की साइंस उपकरण इंडस्ट्री और करनाल की डेयरी इंडस्ट्री के गुणगान में जुट गई थी।

सारी जद्दोजहद यही थी कि देसां में देस हरियाणा, जहां दूध-दही का खाणा वाली पुरानी कहावत को बदलकर देसां में देस हरियाणा, जहां कदम-कदम कारखाणा में तब्दील कर दिया जाए। लेकिन अच्छी अर्थनीति के इन सपनों पर बुरी राजनीति के अक्स इस कदर हावी हुए कि आज हरियाणा में कदम-कदम पर आगजनी है, गांव-गांव अफवाहें हैं, शहर-शहर दंगे हैं और जिले-जिले में हाइवे बंद हैं।

हैपनिंग हरियाणा के लिए सीएम ने कमरतोड़ मेहनत की

ढलती उम्र वाले मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने हैपनिंग हरियाणा के अपने सपने के लिए पिछली एक तिमाही में कमरतोड़ मेहनत की है। वे अमेरिका, कनाडा तक गए और हाल ही में चीन और जापान से निवेश के हजारों करोड़ के वायदे लेकर लौटे।

देश में भी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में उन्होंने रोड शो किए। लेकिन दुनिया नापने की इस सारी कवायद पर अचानक कुछ डरानेवाले अक्स छा गए।

जीटी रोड पर धू-धू फुंकते टोल प्लाजा, आग के हवाले हुए हुंडाई-शेवरले के शोरूम, गुड़गांव-मानेसर में मारुति के बंद पड़े कारखाने और हाइवे पर कारखानों के माल ढोनेवाले ट्रकों की टूटी-फुंकी तस्वीरें।

हैपनिंग हरियाणा समिट से डेढ़ लाख करोड़ रुपये तो जब आएंगे, तब आएंगे, आज की हकीकत तो ये है कि दंगों ने राज्य के खजाने को बीस हजार करोड़ रुपये के नुकसान के साथ एक साल पीछे कर दिया है।

प्रदेश तो अब अंतरराज्यीय सहयोग तक के लिए तैयार नहीं

बेशक, ये तस्वीरें हैपनिंग हरियाणा की नहीं, बर्निंग हरियाणा की हैं और बैलेंसशीट को पूजने वाला कोई उद्योगपति इनसे खौफ खाएगा। अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक सहयोग तो क्या, खबरें तो बता रही हैं कि प्रदेश तो अंतरराज्यीय सहयोग तक के लिए तैयार नहीं है।

आज हरियाणा के सिर पर सिर्फ दिल्ली का पानी रोकने का ही इल्जाम नहीं है, उसे इसके लिए भी कठघरे में खड़ा किया जाएगा कि दूध, सब्जी, अनाज, दलहन जैसी चीजों का आवागमन ठप करके, उसने समूचे उत्तर भारत को आने वाले कई हफ्तों तक महंगाई के दुष्चक्र में झोंक दिया, जिसकी सबसे बुरी मार निम्न और मध्य वर्ग झेलेगा।

ऐसे में मेक इन हरियाणा तो छोड़िए, आज के हरियाणा ने तो मेक इन इंडिया के अभियान को ही खतरे में डाल दिया है, क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में आगजनी और दंगाराज की तस्वीरें कुछ मिनटों में दुनिया भर में वायरल हो रही हैं। निश्चित तौर पर, सरकार हैपनिंग हरियाणा समिट को टालेगी नहीं।

टालना चाहिए भी नहीं, क्योंकि इसका मतलब होगा देश और दुनिया के सामने यह कुबूल कर लेना कि सरकार को खुद अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर पर, अपने प्रबंध पर भरोसा नहीं। सरकार की सारी कोशिश जल्द से जल्द आग बुझाने और जनजीवन बहाल करने पर होनी चाहिए।
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हैपनिंग हरियाणा का सपना एक पवित्र सपना है

हैपनिंग हरियाणा का सपना एक पवित्र सपना है। याद रहे गुजरात के पटेलों की तरह हरियाणा का जाट आंदोलन भी जमीन की घटती जोत, प्राइवेट सेक्टर की घटती दिहाड़ी और सरकारी नौकरियों में कायम सुरक्षा और वेतन बढ़ोतरी के प्रलोभन से उपजा है। इसका दीर्घकालिक समाधान प्राइवेट सेक्टर के उद्योग-कारखानों की नौकरियों में बढ़त और उनके वेतनमानों में सुधार ही है।

हैपनिंग हरियाणा जैसे सम्मेलन प्राइवेट सेक्टर में निवेश और रोजगार बढ़ाने के लिए ही आयोजित किए जाते हैं। जरूरत बस इस बात की है कि सपने देखते हुए कानून व्यवस्‍था के महकमे कहीं सोते ही न रह जाएं। हरियाणा ही नहीं, पूरे देश में वोट की बुरी राजनीति, रोजगार की अच्छी अर्थनीति के रास्ते में खड़ी है।

बेवजह नहीं कि हरियाणा में जो आंदोलन सिर्फ ओबीसी कोटे की मांग के लिए था, वह देखते-देखते जाट- पंजाबी या जाट-व्यापारी में बदल गया। हरियाणा ही नहीं, पूरे देश में वोट की बुरी राजनीति, रोजगार की अच्छी अर्थनीति के रास्ते में खड़ी है। इस नकारात्मक राजनीति को हारना ही है, क्योंकि अंततः जीत दंगाइयों की नहीं, स्वप्नदर्शियों की होती है।
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