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Haryana: भाजपा खुद को मान रही सुरक्षित, गांवों में अधिक मतदान से कांग्रेस को संजीवनी की आस, ये हैं समीकरण

Sun, 26 May 2024 07:01 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

दल मतदान के समीकरणों में उलझे हैं। पिछली बार के मुकाबले कम मतदान से भाजपा को लाभ मिलने की संभावना है। जीटी बेल्ट और बागड़ के इलाकों में अधिक मतदान से कांग्रेस उत्साहित है। किसान आंदोलन प्रभावित रहे जिलों में अन्य जिलों के मुकाबले अधिक मतदान हुआ है। 
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हिसार के बरवाला क्षेत्र में एक बूथ पर मौजूद ग्रामीण। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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हरियाणा लोकसभा की दसों सीटों पर हुए मतदान के बाद राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण बनाने में जुट गए हैं। हालांकि, प्रदेश की अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र और अलग-अलग बेल्ट हुए अलग-अलग मतदान ने दलों को उलझाकर रख दिया है। पिछले लोकसभा चुनावों के मुकाबले इस बार कुल मतदान कम होने को जहां भाजपा इसे अपने हक में मान रही है। भाजपा का मानना है कि इसका मतलब साफ है कि एंटी इंकमबेंसी जैसी कोई लहर नहीं थी।

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दूसरी तरफ कांग्रेस को ग्रामीण क्षेत्रों में हुए अधिक मतदान से संजीवनी की उम्मीद है। खास बात ये रही कि किसान आंदोलन से प्रभावित इलाकों में मतदान अधिक हुआ है। अंबाला व सिरसा लोकसभा क्षेत्र इसके उदाहरण हैं। इन दोनों लोकसभा क्षेत्रों में प्रदेश में सबसे अधिक मतदान हुआ है और दोनों ही सीटें आरक्षित हैं। इनके अलावा, कुरुक्षेत्र और करनाल में भी इसका असर दिखा है।

चुनाव आयोग के 8 बजे के बुलेटिन के अनुसार, सिरसा में सबसे अधिक 69.01 फीसदी मतदान हुआ है। यहां भाजपा के अशोक तंवर और कांग्रेस की कुमारी सैलजा प्रत्याशी हैं। इसी प्रकार, आरक्षित अंबाला सीट पर कांग्रेस के वरुण मुलाना और भाजपा की बंतो कटारिया में कड़ा मुकाबला दिख रहा है। यहां 67.0 फीसदी मतदान रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों क्षेत्रों में अधिक मतदान भाजपा प्रत्याशियों के लिए परेशानी बढ़ाने वाला है। दोनों ही क्षेत्र जाट, सिख, मुस्लिम और अनुसूचित जाति प्रभावित इलाके हैं।
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इसके बाद, कुरुक्षेत्र 66.03 और करनाल में 63.02 प्रतिशत मतदान रहा है। इन दोनों ही लोकसभा क्षेत्रों में भी किसान आंदोलन का पूरा प्रभाव रहा था, क्योंकि दोनों ही जिलों में भारतीय किसान यूनियन मजबूत हैं। कुरुक्षेत्र में तो भाकियू प्रदेशाध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने खुले तौर पर भाजपा का विरोध कर इनेलो के प्रत्याशी अभय चौटाला को समर्थन किया था।

वहीं, करनाल में टिकैत गुट की भाकियू के राज्य प्रधान रतन मान का प्रभाव है और उन्होंने सत्ता धारी दलों के विरोध के अलावा समर्थन का जिम्मा खुद कार्यकर्ताओं पर छोड़ दिया था। खासकर गांवों में अधिक मतदान भाजपा प्रत्याशियों के लिए चिंता बढ़ा रहा है।

इसके अलावा, किसान आंदोलन का असर भिवानी-महेंद्रगढ़ 65.3 प्रतिशत और हिसार में 64.07 प्रतिशत मतदान को भी किसान आंदोलन का असर माना जा रहा है। यहां पर शहरों में मतदान कम हुआ है और गांवों में अधिक लोगों ने मत का प्रयोग किया है। वहीं, रोहतक में 64.6 और सोनीपत में 62.3 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया, जबकि यहां अधिक मतदान की संभावनाएं थी। गौरतलब है कि यूं तो किसान आंदोलन के दौरान पूरा प्रदेश प्रभावित रहा था। पंजाब के साथ लगते जिलों के साथ-साथ दिल्ली बाॅर्डर के साथ लगते इलाके भी इससे खासे प्रभावित रहे थे। लोकसभा चुनावों से पहले खुफिया विभाग ने भी रिपोर्ट दी थी कि प्रदेश की सात लोकसभा सीटों पर किसान आंदोलन का असर दिखेगा। मतदान प्रतिशत भी कुछ इसी तरह का संकेत दे रहा है।

जीटी बेल्ट, बागड़ और बांगर में भी अधिक और अहीरवाल में कम
जीटी बेल्ट, बागड़ और बांगर के इलाकों में अधिक मतदान हुआ है। यह वही बेल्ट हैं, जहां पर सबसे अधिक किसान आंदोलन का असर रहा था, क्योंकि अंबाला से ही आंदोलन शुरू हुआ था और यह जीटी रोड से होते हुए कुरुक्षेत्र, करनाल, पानीपत और सोनीपत के दिल्ली के साथ लगते बार्डर तक किसान पहुंचे थे। इसके बाद, पंजाब के साथ-साथ लगते बागड़ी क्षेत्र सिरसा और हिसार प्रभावित रहे थे। इनके साथ ही बांगर के क्षेत्र, जींद, कैथल के किसानों ने बढ़-ढ़कर किसान आंदोलन में हिस्सा लिया था। अहीरवाल और खासकर दक्षिण हरियाणा की गुरुग्राम, फरीदाबाद में मतदान 60 फीसदी से कम रहा, ये भाजपा के लिए राहत की बात है। इसी प्रकार, जाट लैंट और अहीरवाल दोनों को मिलाकर बनी भिवानी महेंद्रगढ़ सीट में भी मतदान खासा रहा है और यहां पर 65 फीसदी तक मतदान हुआ है। अधिक मतदान को कांग्रेस अपने हक में मान रही है, क्योंकि अहीरवाल में भाजपा पिछले दस साल से मजबूत स्थिति में है और तीन सांसदों के साथ साथ कई विधायक भाजपा के हैं।
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