नाम-प्रीतम सिंह। उम्र- 47 साल। निवासी उरलाना कलां, जिला पानीपत। शिक्षा-मात्र आठवीं पास। उपलब्धि-कृषि विश्वविद्यालयों से ऊंची डिग्रियां पाने वाले कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों तक की क्लास लेकर उन्हें अपने नए प्रयोग का जमीनी ज्ञान दे चुके हैं।
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प्रयोग के चलते भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र (आईएआरआई) की फेलोशिप और कई अवार्ड उनके खाते हैं। यह सब बासमती धान की खेती के दौरान पानी की खपत में एक तिहाई बचत करने के उनके प्रयोग के बूते संभव हो पाया।
उनकी उपलब्धि पर बीबीसी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी और गांव पहुंचकर उन पर एक डाक्यूमेंटरी तक तैयार कर दी, जिसे जल्द ही दुनियाभर के किसानों को दिखाया जाएगा।
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पानी की बर्बादी को लेकर थे चिंतित
यह कारनामा करने वाले जागरूक किसान प्रीतम सिंह खेती में पानी की बर्बादी को लेकर शुरू से ही बेहद चिंतित रहे। वह चाहते थे कि किसान सरकार द्वारा छेडे़ गए फसल विविधिकरण अभियान के तहत धान और गेहूं की परंपरागत खेती को छोड़कर पानी की कम खपत वाली सूरजमुखी, गन्ना और मक्का की खेती को अपनाएं।
मगर इसमें तमाम प्रयास के बाद उपरोक्त फसलें धान का विकल्प नहीं बन सकीं। कारण इसमें एक सच्चाई सामने आई कि चावल खाने वाला तो चावल की मांग करेगा, उसके आगे किसी अन्य अन्न से बना खाना कैसे परोसा जा सकता है।
यह बात प्रीतम सिंह के दिमाग में बैठ गई और उन्होंने धान की खेती को छोड़ने की बजाय पानी की खपत कम करके किसानों को नए नई राह दिखाने की ठान ली।
जीरो टिलेज मशीन से रोपाई कर बचाया पानी
कई साल पहले अपने खेत में कंबाइन से गेहूं की फसल काटने के बाद उन्होंने वहां पर बचे अवशेष को जलाने या ट्रैक्टर से जुताई करने की बजाय जीरो टिलेज मशीन से सीधे धान की रोपाई कर दी। इससे एक तो जमीन संवारने में प्रथम चरण में खर्च होने वाला पानी बच गया और दूसरे खेत में काफी मात्रा में पानी भरकर रोपाई की नौबत नहीं आई।
जीरो टिलेज से रोपाई करने से सीजनभर पानी की खपत काफी कम हो गई। बारिश होने पर खेत का पानी इधर-उधर बहने की जगह जीरो टिलेज के इस्तेमाल के कारण जमीन के उबड-खाबड़ होने की वजह से वहीं पर खड़ा हो गया। इसे वाटर रिचार्जिंग विधि तेज हो गई।
इतना ही नहीं, सामान्यत: 35 से 40 दिन में तैयार होने वाले धान की पनीरी को स्वयं की तकनीक से मात्र सात दिन में तैयार कर पानी की भारी बचत करके कृषि वैज्ञानिकाें को एक नई राह दिखा दी।
वैज्ञानिकों की टीम ने माना, पानी की बचत
भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली, कृषि विश्वविद्यालय, हिसार और कृषि विज्ञान केंद्र, ऊझा की टीम ने किसान प्रीतम सिंह के खेत में पहुंचकर उनके द्वारा अपनाई विधि की बारीकी से जांच-परख की।
अपने सर्वे में कृषि वैज्ञानिकों ने उनके द्वारा बासमती धान 1121 के खेती में एक तिहाई पानी की बचत करने को प्रमाणित कर दिया। प्रीतम सिंह द्वारा खेती में किए जा रहे प्रयोग जल्द ही कृषि के क्षेत्र में चर्चित हो गए।
आईएआरआई ने उनकी इस उपलब्धि के लिए 2012 में अपनी फेलोशिप देकर उनके जज्बे को खास अंदाज में सलाम किया। बाद में उनके पास देश के नामचीन कृषि विश्वविद्यालयों और आईएआरआई से न्योते आने लगे।
न्योते भी जलपान के लिए नहीं बल्कि सेमिनारों में मौजूद ऊंची डिग्रियां लेकर कृषि वैज्ञानिक बनने वालों को कृषि के नए पाठ पढ़ाने के लिए। अब यह सिलसिला कई साल से चला आ रहा है।
अवार्ड और बीबीसी की टीम पहुंची उनके दरवाजे
प्रीतम सिंह कृषि क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों के चलते कई अवार्ड हासिल कर चुके हैं। उनकी उपलब्धि की गूंज सुनकर बीबीसी की टीम 13 अक्तूबर 2013 को उनके दरवाजे पर पहुंच गई।
टीम ने उनके खेत में जाकर एक डाक्यूमेंटरी तैयार की, जिससे जल्द ही दुनियाभर में दिखाया जाएगा। हाल ही में 19 जनवरी को झज्जर में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें अवार्ड और 50 हजार रुपये का पुरस्कार देकर सम्मानित किया।
प्रीतम सिंह का कहना है कि आज के दौर में कम से कम पानी की खपत करते हुए खेती करने की चुनौती है। प्रकृति द्वारा सामूहिक तौर पर प्रदत्त जमीनी पानी के भंडार को बचाना होगा। पानी नहीं तो कल जीवन नहीं।
पानी बचाने के लिए किसान नई तकनीक अपनाएं। वे इसकी शुरुआत करने से हिचकिचाते हैं तो जहां पहले से नई तकनीक पर खेती हो रही, वहां जाकर देखे-सीखें और बाद में अपने खेतों में अमल में लाएं। ऐसा करने से पानी की बचत तय है।