हरियाणा की जनता बीते तीन चुनाव से केंद्र में सत्तासीन दल पर ही यहां भी भरोसा जताती आ रही है। हरियाणवियों ने उसी दल को सत्ता सौंपी, केंद्र में जिसकी सरकार हुई। वैसे तो यह चलन 2000 से शुरू हुआ, लेकिन उस समय भाजपा-इनेलो गठबंधन की सरकार थी और भाजपा ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही समर्थन वापस ले लिया था। बावजूद इसके चौटाला की सरकार पांच साल चली।
2004 में केंद्र में कांग्रेस सत्तासीन हो चुकी थी। हरियाणा में 2005 में विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस को भारी जनसमर्थन मिला और पार्टी 67 सीटों के साथ सत्ता पर काबिज हुई। लोकसभा सांसद भूपेंद्र सिंह हुड्डा पहली बार हरियाणा के सीएम बने। 2009 में केंद्र में दोबारा कांग्रेस नीत यूपीए सरकार सत्तासीन हुई। इसके बाद हरियाणा में भी विधानसभा चुनाव हुए।
कांग्रेस को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन 40 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनने से सरकार बनाने का दावा ठोकने में सफल रहे। निर्दलीय और हजकां विधायकों के समर्थन से भूपेंद्र हुड्डा दोबारा सीएम बने और प्रदेश की कमान संभाली। कांग्रेस में आए हजकां विधायक दलबदल कानून के तहत फंस गए और उन्हें अयोग्य करार दे दिया गया, हालांकि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल रही।
केंद्र में लोकसभा चुनाव के बाद 2014 में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ काबिज हो गई। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, इसके बाद हरियाणा में भी भाजपा की लहर चल गई। 2009 के चुनाव में मात्र चार सीटों पर सिमटी पार्टी 47 सीटें लेकर पूर्ण बहुमत लेकर सत्तासीन हुई। इसके बाद भाजपा का ग्राफ बढ़ता ही गया। पार्टी ने प्रदेश में न केवल नगर निगम चुनाव जीते, बल्कि अपने मेयर भी बनाए।
जींद उपचुनाव भी जीता। 2019 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 75 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है और उसे हासिल करने के लिए पार्टी पूरी ताकत झोंके हुए हैं।