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खोई जमीन तलाश रहा इनेलो: अस्तित्व की लड़ाई के लिए इस दल का लिया साथ, जजपा-BJP से नाराज जाट वोट खींचने की कोशिश

Tue, 24 Sep 2024 09:45 AM IST
शाहरुख खान विजय गुप्ता, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) खोई जमीन तलाश रहा है। अस्तित्व की लड़ाई के लिए इस बार बसपा का साथ लिया है। जजपा से ताऊ की विरासत का उत्तराधिकारी बनने की भी जंग है। जजपा और भाजपा से नाराज जाट वोट खींचने की कोशिश है। 
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haryana election - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पूर्व उपप्रधानमंत्री, दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे कद्दावर जाट नेता दिवंगत चौधरी देवीलाल के संरक्षण में बना और पनपा, लेकिन एक दशक से प्रभावहीन होता जा रहा इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) इस विधानसभा चुनाव में अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। 
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नेताओं की कमी कहें या फिर जातीय जमा-जोड़ की राजनीति, इस बार वह बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन में है। उसने 51 प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि बसपा 38 सीटों पर लड़ रही है। एक सीट पर क्षेत्रीय दल हलोपा से गठबंधन करना पड़ा है। 

खोई जमीन तलाश रहे इनेलो के लिए यह चुनाव ताऊ चौधरी देवीलाल की राजनीतिक विरासत का असली उत्तराधिकारी साबित करने का अवसर भी है। उम्मीदवार खड़ा करने के लिए जो संघर्ष इनेलो को करना पड़ा है, वह उसके गहरे संकट को बयां करता है। 
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गुटबाजी और दलबदल के कारण पार्टी का आधार खत्म होता गया है। चौटाला परिवार के भीतर विभाजन के कारण 2018 में जननायक जनता पार्टी (जजपा) का गठन हुआ था, जिसने इनेलो के प्रभाव को और कम कर दिया। 

एक समय में प्रमुख राजनीतिक ताकत रहा इनेलो 2005 में कांग्रेस से हारने के बाद कमजोर पड़ता गया। हालांकि पार्टी ने 2014 में 19 विधायकों के साथ प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरकर वापसी की और महासचिव अभय चौटाला विधानसभा में विपक्ष के नेता बने। 

 

एंटी इंकम्बेंसी की वजह से कांग्रेस से विमुख हुआ जाट वौट बैंक मोदी लहर में भी भाजपा के पक्ष में पूरा नहीं गया, उसने इनेलो को विकल्प चुना। इनेलो की ही वजह से कांग्रेस 17 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर आ गई।

 

अगले ही चुनाव 2019 में अभय चौटाला विधानसभा में इनेलो के एकमात्र विधायक थे। इसका कारण 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले इनेलो में चौधरी देवीलाल के दो पोतों (ओम प्रकाश चौटाला के बेटों) अभय और अजय चौटाला के बीच फूट थी। 
 

अभय इनेलो में ही रहे और उनके भाई अजय के बेटे दुष्यंत चौटाला ने जजपा का गठन किया। जजपा ने 87 सीटों पर चुनाव लड़ा और 10 सीटें जीतीं। भाजपा के साथ गठबंधन किया और दुष्यंत मनोहर लाल के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार में उप मुख्यमंत्री बने। 

 

इनेलो के पतन से पैदा हुआ राजनीतिक शून्य अब भाजपा के उदय से भर गया है। जाट बहुल इस पार्टी के अनेक नेता भाजपा और कांग्रेस में चले गए हैं। इस बार इनेलो के 31 पूर्व नेता भाजपा या कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें से कुछ नेताओं ने एक दशक से भी पहले पाला बदल लिया था। 

 

इनेलो छोड़कर गए करीब 16 नेता भाजपा से चुनाव मैदान में हैं। इनमें इनेलो विधायक और राज्यसभा सदस्य रह चुके रणबीर गंगवा बरवाला से, पूर्व मंत्री राव नरबीर सिंह बादशाहपुर से, मंत्री मूलचंद शर्मा बल्लभगढ़ से, इनेलो सरकार के समय हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के सदस्य रहे लीला राम गुर्जर कैथल से, इनेलो से राज्यसभा सदस्य रहे राम कुमार कश्यप इंद्री से प्रमुख हैं। 

इसी तरह 15 कांग्रेस उम्मीदवारों ने इनेलो से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। इनमें प्रमुख हैं थानेसर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अशोक अरोड़ा जो चार बार इनेलो विधायक व विधानसभा अध्यक्ष रहे हैं। महम से मैदान में उतरे बलराम दांगी पूर्व इनेलो दिग्गज आनंद सिंह दांगी के बेटे हैं।

जाट-दलित वोट बैंक पर ही नजर
नेताओं की कमी के चलते इनेलो बसपा की मजबूरी बन गई है। इससे जातीय समीकरण भी बनाने की कोशिश की गई। इनेलो का परंपरागत वोट बैंक जाट रहे हैं, बसपा के साथ मिलकर वह दलित वोट और खींच सकती है। इनेलो ने 20 जाट व 13 दलितों को टिकट दिया है।

इस गठबंधन का सोशल इंजीनियरिंग का यह फॉर्मूला जितना कामयाब होगा, उतना ही भाजपा को फायदा व कांग्रेस को नुकसान होगा। वजह यह है कि भाजपा से जाट विमुख रहे हैं और कांग्रेस ही उनके पास मजबूत विकल्प है। 

जजपा के प्रति इस बात की नाराजगी है कि उसने किसानों-पहलवानों का साथ न देकर भाजपा का दामन थामे रखा। जजपा को जो वोट आए थे, वह थे तो मूलतः इनेलो के हिस्से के ही, इसलिए इनेलो को उम्मीद है कि अबकी वह वोट वापस उसकी झोली में आ जाएगा। उसे खतरा यही है कि कांग्रेस का यह प्रचार काम न कर जाए कि इनेलो व बसपा भी सरकार बनाने के लिए भाजपा का साथ दे सकती हैं।
 

मैदान में परिवार 
इनेलो का प्रयास यही है कि जिस स्थिति में पिछली बार जजपा थी, इस बार उस स्थिति में वह आ जाए। इससे वह यह नेरेटिव बना सकेगा कि चौ. देवीलाल व ओम प्रकाश चौटाला की राजनीतिक विरासत का असली उत्तराधिकारी वही है। खुद ओम प्रकाश चौटाला इनेलो प्रत्याशियों के प्रचार में जुटे हुए हैं। प्राटी महासचिव अभय सिंह चौटाला ऐलनाबाद से लड़ रहे हैं जहां से वह विधायक हैं। 

 

उनके बेटे अर्जुन चौटाला रानियां सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे अपने दादा रणजीत चौटाला (ओमप्रकाश चौटाला के भाई) के सामने उतरे हैं। डबवाली सीट पर भाजपा से आए आदित्य चौटाला (ओमप्रकाश चौटाला के भाई जगदीश के बेटे) को इनेलो ने प्रत्याशी बनाया है। इनेलो ने फतेहाबाद सीट पर अभय चौटाला के चचेरे भाई रवि चौटाला की पत्नी सुनैना चौटाला को प्रत्याशी बनाया है।
 

किसानों के साथ की उम्मीद
अभय सिंह चौटाला ने किसान आंदोलन के दौरान किसानों के पक्ष में और कृषि कानून रद्द न किए जाने के विरोध में विधायक पद से इस्तीफा देकर बड़ा जोखिम लिया था। वह पार्टी के एकमात्र विधायक थे। उपचुनाव में दोबारा चुने गए। इससे उन्होंने किसानों के हितैषी होने की छवि बनाई। इनेलो को उम्मीद है कि भाजपा से नाराज किसान कांग्रेस के बजाय उसे वोट करेंगे।

विस चुनाव में यह हाल
वर्ष      सीटें      मत प्रतिशत
2000      47      29.11
2005      9      26.77
2009      31      25.79
2014      19      24.11
2019      1      2.5
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