बांगर में यू खिसक गई जजपा की जमीन
पिछले विधानसभा चुनाव में बांगर की धरती पर जजपा पार्टी सबसे मजबूत पार्टी के रूप में उभरी थी। पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने खुद उचाना से ताल ठोकी और आसपास के क्षेत्रों में उनका असर दिखा और पार्टी ने इस क्षेत्र में 8 सीटें जीतीं, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन कर सत्ता में रहने और बाद में टूटने के बाद यहां के समीकरण बदल गए हैं।
जजपा के विधायक पार्टी छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं। जजपा के रामनिवास सुरजाखेड़ा, जोगीराम सिहाग, अनूप धानक भाजपा ज्वाइन कर चुके हैं, रामकुमार गौतम भी भाजपा में जा सकते हैं। वहीं, विधायक ईश्वर सिंह कांग्रेस में जा चुके हैं। इसलिए जजपा के पास इस बार अपना गढ़ बचाना बड़ी चुनौती है। भाजपा के साथ गठबंधन करने से यहां के मतदाता जजपा से खासे नाराज हैं।
विकास को तरसता इलाका
हर बार में सत्ता में भागीदारी के बावजूद बांगर का इलाका विकास के लिए तरस रहा है। न तो यहां कोई बड़ा उद्योग है और न ही कोई बड़ा संस्थान। बेरोजगारी यहां बड़ा मुद्दा है। खेतों के लिए नहरी पानी शुरू से बड़ी समस्या है। यहां की जमीन कम उपजाऊ है। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी लोगों को दूसरे जिलों का रुख करना पड़ता है। एक्सप्रेस-वे बनने से जरूर शहरों की तस्वीर बदली है और आसपास की जमीनें काफी महंगी हो गई हैं।
13 में से आठ सीटों पर जीती थी जजपा
विधानसभा क्षेत्र पार्टी
जींद भाजपा
कैथल भाजपा
कलायत भाजपा
उचाना जजपा
नरवाना जजपा
गुहला चीका जजपा
टोहाना जजपा
उकलाना जजपा
जुलाना जजपा
बरवाला जजपा
नारनौद जजपा
सफीदों कांग्रेस
पुंडरी निर्दलीय
कोई स्थानीय नेता नहीं बन पाया सीएम
बांगर को प्रदेश की राजनीतिक राजधानी कहा जाता है। इसलिए सभी दलों का इस बेल्ट पर फोकस रहा है। ताऊ देवीलाल, ओपी चौटाला, भजनलाल, भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी यहां राजनीतिक संघर्ष शुरू कर सत्ता तक पहुंचे हैं। अधिकतर सरकारों में बांगर की हिस्सेदारी रही, लेकिन हरियाणा के अलग प्रदेश बनने के 58 साल बाद भी यहां के किसी स्थानीय नेता को सीएम बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। ओमप्रकाश चौटाला नरवाना से विधायक होते हुए सीएम बने थे, लेकिन उनका मुख्य क्षेत्र सिरसा रहा है। चौधरी बीरेंद्र सिंह और रणदीप सुरजेवाला सीएम पद की दौड़ में रहे, लेकिन यह दौड़ आज भी जारी है।
अधिकतर सीटों पर जाट वर्ग प्रभावशाली
बांगर बेल्ट जाट बहुल है। अधिकतर सीटों पर जाट समाज निर्णायक भूमिका में है। इनके साथ ही ओबीसी, अनुसूचित जाति समाज का भी खासा वोट बैंक है। अलग-अलग सीटों पर रोड़, गुर्जर, ब्राह्मण, सैनी और वैश्य बिरादरी के भी अधिक मतदाता हैं। इस बार भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर है, जबकि जजपा और इनेलो दलित मतदाताओं को साधने की कोशिश में है।
पुराने गढ़ में लौटने की कोशिश में इनेलो
कभी बांगर की धरती इनेलो का गढ़ रहा है। इसी गढ़ को देखते हुए दुष्यंत चौटाला ने अलग पार्टी बनाते ही इस धरती को अपनी कर्मस्थली चुना। इस बार इनेलो इस बेल्ट पर खासा फोकस कर रही है। खुद अभय चौटाला या उनका बेटा अर्जुन चौटाला उचाना से ताल ठोक सकते हैं। इनके अलावा पूर्व सीपीएस रामपाल माजरा कलायत में मजबूत चेहरा हैं। वह इस समय पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष हैं और इनेलो के पुराने नेता हैं। पिछली बार वह इनेलो छोड़कर भाजपा में चले गए थे।
आप को भी इसी बेल्ट से आस
आम आदमी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सुशील गुप्ता और अनुराग ढांडा भी बांगर बेल्ट में सक्रिय हैं। खुद अरविंद केजरीवाल जींद में दो बड़ी रैली कर चुके हैं। डॉ. सुशील गुप्ता का मूल गांव शामलों कलां जींद में पड़ता है और वे जींद शहर से चुनाव लड़ने की मंशा रखते हैं। यहां पर वैश्य समाज के पहले भी कई विधायक रहे हैं। इसी को देखते वह सुशील गुप्ता जींद में सक्रिय हैं, जबकि अनुराग ढांडा कैथल के किठाना गांव से आते हैं।