केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद हरसिमरत कौर बादल अब आगे उनकी प्लानिंग क्या होगी, इसे लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पहली बार पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर 21 सितंबर को पंजाब पहुंचेंगी। इसी दिन वे शिअद अध्यक्ष सुखबीर बादल के साथ दरबार साहिब पहुंचेंगी, जहां शिअद के वरिष्ठ नेतागण भी उपस्थित रहेंगे।
पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष और बठिंडा के सांसद 21 सितंबर को दरबार साहिब पहुंचेंगे। शिअद अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री दोनों अरदास करेंगे और किसान समुदाय के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराएंगे।
गांव-गांव जाकर कृषि अध्यादेशों का विरोध किया जाएगा
उधर, हरसिमरत कौर के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे के बाद पार्टी प्रधान सुखबीर बादल की अध्यक्षता में शिअद कोर कमेटी की बैठक हुई। बैठक में केंद्र की एनडीए सरकार से समर्थन वापस नहीं लेने का फैसला किया गया। सभी सदस्यों ने हरसिमरत के इस्तीफे का समर्थन किया। तय किया गया कि सूबे में किसानों के हित में यदि सड़कों पर भी उतरना पड़े, तो गुरेज नहीं किया जाएगा।
सुखबीर बादल ने कहा कि पहले भी शिअद किसानों के हित के लिए सड़कों पर उतरती रही है। इस बार भी किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार से समर्थन वापसी के संबंध में कोई भी निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया जाएगा। अब गांव-गांव जाकर किसानों के बीच कृषि अध्यादेशों का विरोध किया जाएगा।
अकाली दल को तय करना है कि वह गठबंधन में रहेगा या नहीं
हरसिमरत कौर बादल के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद सूबे में बदले सियासी हालात और गठबंधन के मुद्दे पर पंजाब भाजपा की कोर कमेटी की बैठक में चर्चा हुई। बैठक में भाजपा नेताओं की राय थी कि अब अकाली दल को तय करना है कि वह गठबंधन में रहेगा या नहीं। उधर, शिरोमणि अकाली दल कोर कमेटी ने फैसला किया है कि एनडीए सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया जाएगा।
भाजपा मुख्यालय में आयोजित पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष अश्वनी शर्मा ने कहा कि कृषि अध्यादेश किसानों के हितों की रक्षा करने वाले हैं। भाजपा किसानों के जीवन में बेहतर बदलाव लाने के उद्देश्य से कृषि अध्यादेश लेकर आई है। उन्होंने कहा कि हरसिमरत कौर बादल का केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना दुखद है। लेकिन इस मामले में भारतीय जनता पार्टी कुछ नहीं कर सकती।
अब यह अकाली दल को तय करना है कि वह गठबंधन में रहेगा या नहीं। उन्होंने कहा कि सूबे के किसानों तक अध्यादेशों के संबंध में सही जानकारी नहीं पहुंच पायी है। इसी कारण वे इसका विरोध कर रहे हैं। भाजपा कार्यकर्ता गांव- गांव जाकर किसानों को अध्यादेशों के हर पहलू से अवगत कराएंगे ताकि उनको पता चल जाए कि इनसे उन्हें कितना लाभ होगा।
2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा संग मंच साझा करना आसान नहीं
केंद्र सरकार के तीन अध्यादेश लोकसभा में पास होने के बाद शिरोमणि अकाली दल पूरी तरह से असहज है। अकाली दल के लिए 2022 में भाजपा के साथ मंच साझा करना आसान नहीं होगा, क्योंकि अब तक अकाली दल पानी, चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने के अलावा किसानों के मुद्दों पर हमेशा पंजाब में वोट बटोरता रहा है लेकिन अब इन मुद्दों पर जनता के बीच जाना आसान नहीं है।
पंजाब में भारतीय जनता पार्टी व अकाली दल के बीच पुराना गठबंधन है। इस गठबंधन को हिंदू-सिख भाईचारे की सांझ का हवाला देकर अकाली दल व भाजपा वोट बटोरते रहे हैं। गठबंधन ने पंजाब में पांच बार अपनी सरकार बनाई है। केंद्र में कांग्रेस सरकार को अकाली दल ने इन मुद्दों पर खूब घेरा है लेकिन इस बार अकाली दल खुद घिर गया है।
अकाली दल छह साल में न तो चंडीगढ़ का मामला हल करवा पाया और न ही पानी का विवाद। उल्टा अकाली दल को नामोशी व विरोध झेलना पड़ा है। खेती के तीन अध्यादेश के मामले में अकाली दल को झटका लगा है। वरिष्ठ अकाली नेताओं के अनुसार अकाली दल को आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ लड़ना आसान नहीं है।
अगर भाजपा व अकाली दल में गठबंधन जारी रहा तो चुनाव के दौरान इन मुद्दों पर जनता व किसानों का विरोध झेलना पड़ेगा। हरियाणा की तर्ज पर अकाली दल व भाजपा अलग-अलग चुनाव लड़ने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। हरियाणा विधानसभा में अकाली दल का समझौता इनेलो से है, जबकि भाजपा के विरोध में अकाली दल हरियाणा में आग उलगता रहा है। ऐसे में अकाली दल ने अब रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है कि पंजाब में अगर भाजपा के साथ चुनाव लड़ा तो जनता के बीच जाना आसान नहीं होगा।