किसानों के विरोध और अंदर खाते असंतुष्ट नेताओं की वजह से भाजपा उम्मीदवारों के सामने चुनौतियां बढ़ी हुई हैं। वहीं, कांग्रेस को दोनों ही सीटों पर लंबे समय से एक अदद जीत का इंतजार है। हिसार लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस को 20 साल से जीत नहीं मिली, वहीं सिरसा सीट पर भी पिछले दो चुनावों में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। हालांकि अभी तक कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित नहीं किए, मगर हिसार से बृजेंद्र सिंह और सिरसा से कुमारी सैलजा का नाम चर्चा में है। हिसार में चौधरी बीरेंद्र सिंह के आने से कांग्रेस को मजबूती मिली है। उधर, सिरसा से सैलजा दो बार और उनके पिता चार बार सांसद रह चुके हैं, जो कांग्रेस के लिए मजबूती का काम कर सकते हैं। वहीं, दोनों ही सीट पर इनेलो और जजपा को हलके में नहीं लिया जा सकता। दोनों का अच्छा खासा वोट बैंक है। मगर दोनों किसको फायदा और नुकसान पहुंचाएंगे। यह देखने वाली बात होगी।
सत्ता विरोधी लहर भुनाने की तैयारी में कांग्रेस...मगर इतना आसान नहीं
कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर के साथ किसानों के आंदोलन को भुनाने की तैयारी में है। मगर यह इतना आसान नहीं है। पार्टी ने हिसार में 2004 में जीत दर्ज की थी। तब जय प्रकाश कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे थे। उसके बाद से पार्टी कोई चुनाव नहीं जीत पाई है। लोकसभा के नौ विधानसभा क्षेत्रों में एक भी विधायक कांग्रेस का नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में आदमपुर सीट से कांग्रेस के कुलदीप बिश्नोई विधायक चुने गए थे, जो अब भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इस सीट से उनके बेटे भव्य बिश्नोई भाजपा से विधायक हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 15.7 फीसदी वोट मिले थे। इससे पहले 2014 के चुनाव में सिर्फ 8.9 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि चौधरी बीरेंद्र सिंह के आने से कांग्रेस को मजबूती मिलेगी। ऐसा ही कुछ हाल पार्टी का सिरसा लोकसभा सीट पर है। किसी समय सिरसा लोकसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ कहलाता था, लेकिन 2009 के बाद से कांग्रेस ने यहां से जीत का स्वाद नहीं चखा है। नौ विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के पास सिर्फ दो ही सीटें डबवाली और कालांवाली हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट पर कांग्रेस को लीड नहीं मिली थी। 2019 के चुनाव में कांग्रेस को 29.6 और 2014 में 30.4 फीसदी वोट मिले थे।
डेरा फैक्टर और बढ़ता नशा बड़ा मुद्दा
सिरसा लोकसभा क्षेत्र में डेरा सच्चा सौदा एक बड़ा फैक्टर है, जो चुनावों में अहम भूमिका निभाता रहा है। डेरे से जुड़े अनुयायियों की संख्या इस क्षेत्र में काफी ज्यादा है। फिलहाल डेरा प्रमुख रोहतक जेल में बंद हैं। मगर वह पैरोल पर समय-समय पर आते रहे हैं।
- चुनाव से पहले डेरे से उनके अनुयायियों को संदेश दिया जाता है कि वह किसी राजनीतिक दल के समर्थन में वोट डालें। वहीं, सिरसा और हिसार में बढ़ता नशा भी बड़ा मुद्दा है। विपक्ष इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहा है। सिरसा के कई गांव नशे के दुष्प्रभाव से बेहद पीड़ित हैं और लोगों में गुस्सा भी है। हालांकि सरकार की ओर से इस दिशा में कई ठोस कदम उठाए गए हैं।
इनेलो व जजपा की भूमिका
हिसार लोकसभा क्षेत्र से इस बार चौटाला परिवार के तीन सदस्य मैदान में हैं। भाजपा के रणजीत चौटाला के अलावा जजपा से पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला की मां नैना चौटाला और इनेलो से सुनैला चौटाला मैदान में हैं। दोनों आपस में जेठानी देवरानी हैं। दरार पड़ने से पहले चौटाला परिवार इस सीट पर अच्छा प्रभाव रखता था। इनेलो इस सीट पर तीन बार चुनाव जीती है। 1998, 1999 और 2014 में। यदि चौटाला परिवार की बात करें तो उनका रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। चौटाला परिवार पांच में सिर्फ एक बार इस सीट पर जीत हासिल कर पाया है। इस सीट से ओेमप्रकाश चौटाला, अजय सिंह चौटाला, रणजीत सिंह चौटाला को हार झेलनी पड़ी है। सिर्फ दुष्यंत ही चुनाव जीत पाए हैं। अब फिलहाल इनेलो और जजपा की राह अलग-अलग है। जजपा का चार विधानसभा सीटों पर कब्जा है। वहीं, इनेलो का कोई विधायक नहीं है। वहीं, सिरसा लोकसभा सीट पर इनेलो को लोकसभा चुनाव में अच्छा वोट शेयर मिलता रहा है। सिरसा की ऐलनाबाद विधानसभा क्षेत्र से अभय सिंह चौटाला विधायक हैं।
भाजपा की राह में भी कम नहीं हैं कांटे
- हिसार से दो कद्दावर नेता कैप्टन अभिमन्यु और पूर्व सीएम भजन लाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई टिकट मांग रहे थे। दोनों ही लंबे समय से सक्रिय थे और इनमें से किसी एक को टिकट मिलना तय था, मगर आखिरी समय में निराशा हाथ लगी। पार्टी ने अभिमन्यु की ड्यूटी असम में लगा रखी है, मगर उनके समर्थकों में टीस है। वहीं, कुलदीप सक्रिय नहीं हुए हैं। उनका क्षेत्र में अच्छा प्रभाव है। भव्य भी एक दिन पहले आदमपुर में हुई पार्टी की सभा में नहीं पहुंचे। ऐसे में कुलदीप के समर्थकों को जोड़े रखना चुनौती होगी।
- रणजीत चौटाला और अशोक तंवर को किसानों का विरोध झेलना पड़ रहा है। जगह-जगह किसानों ने दोनों उम्मीदवारों का विरोध जताया है। इससे भाजपा की भी चिंता बढ़ गई है। पार्टी अब इस चुनौती से निपटने के लिए नई रणनीति पर विचार कर रही है।
- सिरसा से उम्मीदवार अशोक तंवर 2009 के बाद से कोई चुनाव नहीं जीते हैं, वहीं दलबदल का तमगा भी उन्हें परेशान कर रहा है। इसी तरह से रणजीत 1987 से चुनाव लड़ रहे हैं, मगर सिर्फ दो ही चुनाव जीते हैं। पिछला विस चुनाव 31 साल बाद जीता था।
- चौधरी बीरेंद्र सिंह का परिवार भाजपा से अलग हो चुका है। सिरसा की मौजूदा सांसद सुनीता दुग्गल भी कम सक्रिय दिख रही हैं।
भाजपा ने जातीय-क्षेत्रीय समीकरण में किया नया प्रयोग..कांग्रेस को उतारने हैं प्रत्याशी
भाजपा ने हिसार से सिरसा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली रानिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक व ऊर्जा व जेल मंत्री रणजीत चौटाला को उम्मीदवार बनाया है। जाट बहुल्य क्षेत्र में भाजपा ने अपने दो मजबूत नेता कैप्टन अभिमन्यु और कुलदीप बिश्नोई को दरकिनार कर पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल के बेटे रणजीत चौटाला पर भरोसा जताया है। उनकी छवि साफ है और इलाके में सक्रिय रहे हैं। इस सीट पर भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव में करीब 51.2 फीसदी वोट मिले थे। उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में 36.3 प्रतिशत वोट मिले थे। नौ विधानसभा क्षेत्रों में से पांच पर भाजपा का कब्जा है। साथ ही भाजपा एक रणनीति पर काम कर रही है।
चौटाला को उतारकर पार्टी जाट वोटों के साथ देवीलाल के गढ़ में भी सेंध लगाने की कोशिश में है। पार्टी मानकर चल रही है कि गैर जाट वोटों का झुकाव भी उसकी तरफ रहने वाला है। पार्टी आंकड़ों और समीकरण के हिसाब से खुद को मजबूत मानकर चल रही है। हिसार में प्रभावशाली जिंदल परिवार को भी भाजपा ने अपने साथ जोड़ा है। दूसरी तरफ, सिरसा में मौजूदा सांसद का टिकट काटकर कांग्रेस के पुराने नेता अशोक तंवर को मैदान में उतारा है। तंवर को पूर्व सीएम मनोहर लाल पार्टी में लाए थे।
लिहाजा तंवर के साथ मनोहर लाल की प्रतिष्ठा भी जुड़ी है। तंवर की चुनाव कमान खुद मनोहर लाल ने संभाल रखी है। पहले उन्होंने सिरसा के प्रभावशाली नेता गोपाल कांडा को जोड़ा और फिर भाजपा-जजपा के गठबंधन में अहम भूमिका निभाने वाली मीनू बेनीवाल को भाजपा में शामिल कराया। सिरसा लोकसभा क्षेत्र के नौ विधानसभा क्षेत्रों में से दो पर भाजपा का कब्जा है। वहीं, विधायक रणजीत सिंह चौटाला और गोपाल कांडा भाजपा के समर्थन में हैं। सिरसा में भाजपा को पिछले चुनाव में 52.3 फीसदी वोट मिले थे। सभी नौ विधानसभाओं में भाजपा ने अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार को हराया था। दूसरी तरफ कांग्रेस को अभी दोनों सीटों पर प्रत्याशी उतारने है।