मरीजों के बढ़ते बोझ के बीच पीजीआई की एनुअल रिपोर्ट ने संस्थान को एक उत्साहित करने वाली तस्वीर पेश की है। 2015 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक पहली बार पीजीआई के अंदर होने वाली मौतों के ग्राफ में गिरावट दर्ज की गई है। जनवरी 2015 से लेकर दिसंबर 2015 तक ग्रॉस डेथ रेट 5.8 प्रतिशत दर्ज किया गया है।
पिछले साल यानी 2014 का ग्रॉस डेथ रेट 6.1 प्रतिशत दर्ज किया गया था, जबकि 2013 में पीजीआई में होने वाली कुल मौतों का प्रतिशत 6.2 था। यदि 2012-13 की बात करें तो उस वक्त यह 6.7 प्रतिशत दर्ज किया गया था।
यह पीजीआई और यहां पर आने वाले सात प्रदेशों के मरीजों के लिए काफी राहत भरी खबर है। यह रिपोर्ट बताती है कि पीजीआई की तस्वीर अब बदल रही है। मरीजों को क्वालिटी इलाज देने पर फोकस दिया जा रहा है। पिछले साल की रिपोर्ट की खास बात यह है कि लगभग सभी यूनिटों में दाखिल मरीजों की जान बचाने के लिए पीजीआई के डॉक्टरों ने जी-जान लगा दी। फिर चाहे मरीज पीजीआई के इमरजेंसी में दाखिल हुआ हो या फिर एडवांस पीडियाट्रिक्स सेंटर में।
पिछले साल हर दिन चार बच्चों की मौत होती थी
पिछले साल तक पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट में हर एक दिन चार बच्चों की मौत होती थी। साल 2014 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक 15131 बच्चेे दाखिल हुए थे, इनमें से 1716 बच्चों ने दम तोड़ दिया था। हालांकि विशेषज्ञों ने उस दौरान दलील दी थी कि पीजीआई में जब बच्चा आता था तो उस दौरान उसकी बुरी स्थिति होती थी। क्योंकि मरीज चंडीगढ़ का नहीं बल्कि पंजाब-हरियाणा या हिमाचल का होता था। पीजीआई तक पहुंचने में ही काफी समय बर्बाद हो जाता था।
इसलिए दर्ज की गई गिरावट
1. सभी यूनिटों में इंफेक्शन को कंट्रोल करना।
2. मरीजों को तय समय के भीतर हास्पिटल से डिस्चार्ज करना।
3. कायाकल्प योजना के तहत साफ-सफाई पर फोकस।
4. इलाज की लगातार तकनीक अपडेट करना।
बच्चों की मौत का भी ग्राफ गिरा
साल--------एडमिशन-----मौत-----औसत
2012-13-----15243----1678-----35.4
2014---------15131----1716----34.8
2015---------15728---1267-----26.7
कुल मौतों का ग्राफ ऐसे गिरा
साल------डेथ रेट
2015------5.8
2014------6.1
2013------6.2
2012------6.7