इलाज का खर्च सिर्फ निजी अस्पतालों में नहीं बल्कि बड़े सरकारी अस्पतालों में भी काफी ज्यादा है। कई इलाज तो ऐसे हैं, जो आम आदमी की जद से बाहर हो जाते हैं। आम तौर पर सरकारी अस्पतालों में होने वाले खर्चों पर किसी का ध्यान नहीं जाता है, लेकिन यदि गंभीर बीमारियों के इलाज पर नजर डालेंगे तो उनके खर्च काफी ज्यादा हैं।
एक्सपर्ट मानते हैं कि इसकी मुख्य वजह हेल्थ सेक्टर के बजट का कम होना है। सरकार कुल जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत हेल्थ सेक्टर पर खर्च करती हैं। इसकी वजह से सरकारी अस्पताल में 100 रुपये के इलाज में 20 रुपये सरकार खर्च करती है, जबकि 80 रुपये मरीज को खुद से अपनी जेब से लगाने पड़ते हैं। यदि हेल्थ सेक्टर का बजट बढ़ता है तो जाहिर सी बात है कि मरीज की जेब से खर्च होने वाले राशि थोड़ी कम होगी।
इन आंकड़ों पर गौर कीजिए
भारत के सांख्यिकी मंत्रालय की एनएसएसओ 2015 ने देश के हर राज्य व यूटी में सर्वे किया। सर्वे में देखने की कोशिश की कि यदि कोई व्यक्ति अस्पताल में रुकता है तो उसका औसत खर्च कितना आता है।
राज्य----------पुरुष-------महिला-------औसत खर्च
चंडीगढ़-------54414----17914-------34604
पंजाब---------36967----21059--------28539
हरियाणा-------28652----18580--------24214
हिमाचल-------24583----15333-------19431
दिल्ली----------38903----28888-------34658
(स्रोत : नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट)
पीजीआई की स्टडी में क्या आया सामने
हाल ही पीजीआई के कम्युनिटी मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर आफ हेल्थ इकनामिक्स शंकर प्रिंजा व उनकी टीम ने ट्रामा सेंटर में आने वाले चोटिल मरीजों पर खर्च होने वाली राशि संबंधी एक स्टडी की थी। स्टडी में सामने आया कि ट्रामा सेंटर में दाखिल मरीजों का औसत खर्च 25 हजार रुपये है।
मरीजों का 12 महीने तक फालोअप किया गया। इन 12 महीनों में दवाई और अन्य पर करीब 67 हजार रुपये खर्च किए गए। इसमें 75 प्रतिशत राशि सिर्फ दवाओं पर खर्च की गई। यह स्टडी वर्ल्ड के प्रतिष्ठित जरनल लान्सेट पर पब्लिश हुई थी।
इसलिए महंगा पड़ रहा है इलाज
सरकारी अस्पतालों में इलाज महंगा पड़ने का सबसे प्रमुख कारण दवाइयां हैं। किडनी, लीवर, कार्डियो और कैंसर जैसी बीमारियों की दवाएं काफी महंगी हैं। कीमोथेरेपी की कुछ दवाइयों का खर्च 50 हजार रुपये से ज्यादा है। दूसरा कारण लैब टेस्ट व आपरेशन का खरचा है। बड़े आपरेशन की फीस 5 हजार रुपये तक है। इसके अलावा जो सामान खर्च होता है, उसका तो कोई हिसाब नहीं होता।
एम्स के मुकाबले पीजीआई का खर्च बहुत ज्यादा है। वहां पर सिर्फ कुछ इलाज के खर्च हैं, बाकी का कोई खर्च नहीं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिख चुका है। यदि बात नहीं बनी तो पीआईएल डालूंगा।
- अश्विनी मुंजाल, जनरल सेक्रेटरी एमटीए पीजीआई
सरकारी अस्पतालों में खर्च कम करने के लिए सरकारों को हेल्थ पर ज्यादा बजट खर्च करना होगा, तभी रेट कम होगा।
- डा. शंकर प्रिंजा, एसोसिएट प्रोफेसर आफ हेल्थ इकनामिक्स पीजीआई