केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय की ओर से मना किए जाने के बावजूद पीजीआई के 145 सीनियर डॉक्टरों को ट्रांसपोर्ट अलाउंस देने का मामला सामने आया है। इसमें पीजीआई के सभी सीनियर डॉक्टर शामिल हैं।
उन्हें 21 महीने तक ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया जाता रहा। मंत्रालय ने माना है कि नियमों को नहीं मानने से भारत सरकार को करीब एक करोड़ 26 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। इस नुकसान की भरपाई जरूरी है। मंत्रालय ने पीजीआई को आदेश दिया है कि वह सभी डॉक्टरों से जल्द से जल्द ट्रांसपोर्ट अलाउंस की रिकवरी करे, ताकि सरकारी खजाने को हुए नुकसान को भरपाई की जा सके।
2008 में जारी हुआ था पत्र
पीजीआई से मिली जानकारी के मुताबिक 2008 में वित्त मंत्रालय की ओर से एक पत्र जारी हुआ था, जिसमें सीनियर डॉक्टरों को ट्रांसपोर्ट अलाउंस देने से मना कर दिया था। उसके बाद आठ अप्रैल 2013 से लेकर अप्रैल 2015 तक 145 डॉक्टरों को ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया जाता रहा है।
इस दौरान फिर से मंत्रालय को पता चला कि डॉक्टरों को ट्रांसपोर्ट अलाउंस अब भी दिया जा रहा है। उसके बाद सख्ती बरती गई और पीजीआई प्रशासन ने ट्रांसपोर्ट अलाउंस पर रोक लगा दी।
प्रोफेसर और एचओडी स्तर के डॉक्टर
जिन डॉक्टरों को गैरकानूनी तरीके से ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया गया है, उनमें पीजीआई के सभी सीनियर डॉक्टरों के नाम शामिल हैं। इनमें अधिकतर पीजीआई के एचओडी के पद पर कार्यरत हैं या फिर डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं।
इनमें से कई ऐसे प्रोफेसर भी हैं, जो संस्थान से रिटायर भी हो चुके हैं। हालांकि मंत्रालय ने उनसे से भी रिकवरी के आदेश जारी किए हैं। साथ ही यह भी चेतावनी जारी की गई है कि भविष्य में इस तरह की प्रैक्टिस बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
एक साल से आगे नहीं बढ़ी फाइल
पीजीआई के सूत्रों की ओर से दावा किया गया है कि एडमिनिस्ट्रेशन ने सभी डॉक्टरों की लिस्ट बनाकर उनसे रिकवरी की फाइल बनाकर पीजीआई के आला अधिकारियों को भेज दी थी, लेकिन जब इस बारे में सूचना फैकल्टी मेंबरों को मिली तो फाइल आगे नहीं बढ़ पाई।
आला अधिकारियों के पास जाकर फाइल दब कर रह गई। फिलहाल एक साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है लेकिन अब तक डॉक्टरों से रिकवरी नहीं की गई है। पीजीआई के एक आला अधिकारी का मानना है कि डॉक्टरों से रिकवरी कर पाना काफी टेढ़ी खीर है। इस बारे में मंत्रालय ही कुछ कर सकता है।