बुढ़ापे में अकेले रह रहे पिता की अचानक मृत्यु हो गई और अमेरिका में रह रहे बेटे के पास चिता को अग्नि देने की फुर्सत तक नहीं। मौत की सूचना मिलने के बाद बेटे ने जवाब भेजा कि वह पिता के अंतिम संस्कार में नहीं आ सकता। बुआ से सारी रस्में करा ली जाएं। इस इंतजार में पिता का शव चार दिन से पड़ा है।
सात समंदर पार से आए बेटे के संदेश ने रिश्तों के ताने बाने को छिन्न भिन्न कर दिया। सवाल यह है कि क्या इसी दिन के लिए इंसान औलाद की कामना करता है। क्या इसी दिन के लिए जिंदगी भर उनके लिए तिल तिल मरता है कि बुढ़ापे में वही औलाद उसे तड़पने के लिए अकेला छोड़ देगी।
क्या इसी दिन के लिए उनकी ख्वाहिशें पूरी करता है कि जिंदगी के अंतिम क्षणों में एक गिलास पानी तक के लिए वह तरस जाएगा। आखिर क्यों बच्चे अपने पैरेंट्स को यह सजा देते हैं। क्या रिश्तों में आई खटास इतनी बड़ी हो जाती है कि वह मौत के बाद भी नहीं मिटती। चंडीगढ़ में जो कुछ हुआ, उसने खून के रिश्ते को शर्मसार कर दिया।
यह हृदयविदारक वाकया चंडीगढ़ के सेक्टर आठ में हुआ। पंजाब यूनिवर्सिटी से रिटायर प्रोफेसर 68 वर्षीय वीरेंद्र कपूर कोठी में अकेले ही रहते थे। उसी घर में रहकर एक महिला उनकी देखभाल करती थी। बताया जा रहा है कि 24 दिसंबर की शाम को उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई। केयर टेकर महिला उन्हें सेक्टर 16 जनरल अस्पताल लेकर गई, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर शव मोर्चरी में रखवा दिया।